रतलाम। संत शिरोमणी श्री विद्यासागरजी के परम शिष्य और शंका समाधान के निष्णात विद्वान, प्रखर वक्ता मुनिश्री 108 प्रमाणसागरजी महाराज ने शुक्रवार को श्रावक संस्कार शिविर के दौरान उदगार प्रकट किए है कि आज हर कोई धन कमाने की हौड़ में लगा है कोई भी पुण्य नही कमाना चाहता है। मनुष्य में वासना से ज्यादा नशा रुपया कमाने का चढ़ा हुआ है। व्यक्ति बचपन में घुटने चलने की अवस्था से कब्र में पैर लटकाने (मृत्य अवस्था) तक अपने लिए धन जोडऩे की दौड़ में पुण्य कर्मो को भूल जाता है। धन कमाना, संग्रह करना बुरी बात नही है, मगर इस धन का उपयोग पुण्य कार्यो में भी किया जाना चाहिए। सभी को संकल्प लेना चाहिए कि हम अपनी कमाई का 90 प्रतिशत हिस्सा अपने और अपनों के लिए उपयोग करेगे और 10 प्रतिशत हिस्सा किसी जरुरतमंद के सहयोग के लिए दान करेगे। धन अपनी जरुरतों की पूर्ति के लिए जरुर कमाओं मगर समय आने पर जरुरतमंदों की मदद कर पुण्य भी कमाओं। धन का संग्रह बांध की तरह करो, जितना पैसा आए क्षमता से ज्यादा हो जाए तो उसे अच्छे कार्यो में बहाते भी चलो। जीवन में सदा कल्याण बना रहेगा।
पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के अवसर पर चातुर्मास धर्मप्रभावना समिति द्वारा आयोजित श्रावक संस्कार शिविर में दशधर्म प्रवचनमाला के दौरान मुनिश्री प्रमाणसागरजी ने हजारों गुरुभक्तों को मुनिश्री प्रमाणसागरजी ने गुरुभक्तों को धन कमाना,गंवाना, बचाना और लगाना जैसे सूत्र समझा कर उद्गार प्रकट किए है कि धन का संग्रह बुरा नही बल्कि परिग्रह बुरा है।गृहस्थ जीवन में धन संग्रह का उपदेश हमारे तीर्थकर भगवंतों ने भी दिया है। वे कहते है कि धन का संग्रह करो। संग्रह करो मतलब पैसा इक_ा करके रखो, जोड़ते जाओं। मगर जोड़ कर रखना संग्रह है और इससे चिपक जाना परिग्रह है। संग्रह से अनुग्रह होता है और परिग्रह से विग्रह होता है। दान का अंश होता है त्याग सर्वस्य होता है।
धन के दान से आसक्ति मिटती है,
गृहस्थ के अंश को छोडने का नाम ही दान है. दान ही त्याग है. अहसान के लिए नहीं खुद और दूसरो के अनुग्रह के लिए धन का दान ही त्याग है. किसी भी धनोपार्जन मे पाप होता है. निष्पाप होकर धन नहीं कमा सकते हो. जीवन मे अर्थोपार्जन मे हिंसा होती ही है. यही सूक्ष्म हिंसा के भागीदार तुम बनते हो. नौकरी -सेवा व्यापार -धंधे मे हिंसा का अंश होता है. धन तो जोडा लेकिन धन के साथ अर्जित पाप कहा जाएगा. धन के दान से आसक्ति मिटती है, उदारता, अहोभाव आते है पापो का प्रक्षाल होता है.
जरुरत के साथ जरुरतमंदों के लिए करो धन संग्रह : प्रमाणसागरजी
