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“सुप्रीम कोर्ट के कुछ न्यायाधीश कानून की धज्जियां उड़ाने वालों को संरक्षण दे रहे हैं : पूर्व न्यायाधीश राजेंद्र श्रीवास

BySurendra Jain

Jul 29, 2018

भारतीय न्याय पालिका के कतिपय न्यायाधीशों के परिप्रेक्ष्य में कहे जाने में कोई अतिशयोक्ति नही होगी कि धीरे धीरे कानून का, व विधि द्वारा सुस्थापित प्रसिद्ध विधिवेत्ता डायसी का विधि का शासन (Rule of Law) समाप्त होकर जंगल का राज स्थापित होने की और अग्रसर है, “तथा जिसकी लाठी उसकी भैस वाला कानून स्थापित होने जा रहा है, जो व्यक्ति इस देश मे साधन संपन्न, शक्ती शाली, प्रभुत्वसंपन्न व बलशाली है, वर्तमान में कानून की खुले तथा सरेआम धज्जिया उन्ही के द्वारा उड़ाई जाकर संविधान में बने नियमो का मजाक उडाया जा रहा है। वर्तमान में समाज व सरकार मे भी
उन्ही लोगो को सम्मान व महत्वपूर्ण पद उन्हें दिया जाता है, जो माननीय उच्चतम व माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों व प्रचलित विधि व नियमो का खुला उल्लंघन करता हो, उन्हें पुरुस्कृत किया जाता है, तथा जो नागरिक कानूनों के पालन की और ध्यान दिलवाता व सत्य बात कहता है, उसे तिरस्कृत किया जाकर प्रताड़ित व परेशान किया जाता है। यह स्थिति भारत जैसे विशाल प्रजातांत्रिक देश में समाज व संविधान के लिए अत्यन्त शर्मनाक है। संविधान निर्माताओं ने कभी यह नही सोचा होगा कि उनके द्वारा बनाये गए नियमो व आदेशो की किसी माननीय उच्च न्यायलय के अधिकरियो/प्राधिकारियों द्वारा ही धज्जिया उड़ाई जावेगी, आज उन लोगो की आत्माऐ स्वर्ग में खून के आंसू बहा रही होगी। संविधानिक नियमो में वर्णित अनुसार निर्धनों, निर्बलों व समाज के कमजोर व आर्थिक दृष्टि से कमजोर लोगो के संबंध में न्याय प्राप्त करना महज किताबो में पढ़ने वाली बात होती जा रही है। संविधान के अनुच्छेद 14 व 19 की बात करे तो समानता व अभिव्यक्ति की स्वतत्रंता का अधिकार सभी को प्राप्त है, तथा यह बात भी वर्तमान में किताबो में पढ़ने को ही अच्छी लगती है, व्यवहारिकता में बात इसके विपरीत होती जा रही है। हो भी क्यो न क्योकि कानून व नियमो का उल्लंघन करने वालो को बचाये जाने का कार्य भी हमारी देश की सर्वोच्च संस्था माननीय उच्चतम न्यायालय के कतिपय न्यायाधिपति महोदय द्वारा ही किया जा रहा है, (यदि रक्षक ही भक्षक बन जावे, तो उन स्थितियों की कल्पना आप स्वयं कर सकते है)
यदि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा थोड़ी भी सख्ती की जावे, व रोद्र व भयावह रूप दिखाया जावे व कानून का उल्लंघन करने वालो में परस्पर विभेद न किया जावे तो ही विशुद्ध रूप से कानून का राज स्थापित होने की संभावना प्रतीत होती है, किन्तु इस वर्ग विभेद को दूर करने हेतु कानून का पालन करवाने हेतु अपना पराया भूलना होगा, विधि व नियमो का उल्लंघन करने वाला अपराधी चाहे कितने भी उच्च पद पर विराजमान हो, चाहे आर्थिक दृष्टि से कितना भी सम्पन्न हो, व अन्य कोई भी बलशाली किसी भी दृस्टि से हो, अपराधी मतलब अपराधी की भूमिका से देखने पर ही समाज मे न्यायालय के न्यायाधिपति महोदय द्वारा देखने पर ही न्याय होगा, व न्याय की संकल्पना साकार होगी। जैसे बंदूक में भरी गोली दुश्मन व दोस्त में कोई अंतर नही करती है, उसी तरह यदि कानून का पालन करवाने में वर्ग विभेद, व पद को बढ़ावा न दिया जावे, तथा समानता के सिद्धांत का कठोरता से पालन किया जावे (राजा व रंक में कोई भेदभाव न किया जावे) तो कानून का राज स्थापित होंने में किसी प्रकार की कोई देर नही है, इसके पीछे नेक नियत, स्वस्थ मानसिकता, कथनी व करनी में अंतर व पक्के मजबूत इरादे की जरूरत है, जो वर्तमान परिदृश्य में किसी मे बची नही है, सब इस देश मे अपना हित साधने में लगे है। जिस तरह किसी परिवार में यदि परिवार के मुखिया के आदेश का पालन परिवार के सदस्य ही न करते हुए उसका उल्लंघन करे तो आसपास के पड़ोसियों व अन्य लोगो से उनके आदेश का पालन किस मुह से करवाया जा सकता है, जिस तरह माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश का पालन स्वयं उसके अधीनस्थ संस्था माननीय उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश द्वारा ही नही किया जाकर वर्षो से उसका साशय कई आदेशो व निर्देशो का खुला व प्रत्यक्ष रूप से उल्लंघन किया जा रहा है, ऐसी परिस्थिति में अन्य संस्थाओं से आदेश के पालन की अपेक्षा करना महामूर्खता ही होगी। वैसे भी वर्तमान में माननीय उच्चतम न्यायालय का कोई भी आदेश मात्र एक कागज का टुकड़ा ही रह गया है, क्योकि उसके पालन के संबंध में कठोर कार्यवाही स्वयं माननीय उच्चतम न्यायालय के कतिपय न्यायाधीशों द्वारा ही नही की जा रही है, तथा इस संबंध में उनके विरुद्ध कार्यवाही न करते हुए, उन्हें आदेशो का उल्लंघन करने हेतु दुष्प्रेरित किया जाकर उन्हें खुला प्रश्रय व संश्रय दिया जा रहा है, की आप हमारे आदेशो व निर्देशो का उल्लंघन करे, हम आपके विरुद्ध कोई कार्यवाही नही करेंगे। माननीय उच्चतम न्यायालय के कतिपय न्यायाधीशों द्वारा यदि आदेशो व निर्देशो के उल्लंघन के मामलों में यदि थोड़ी भी सख्ती बरती जाती तो, माननीय उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश के कतिपय न्यायाधिपति महोदय, अधिकारी/ प्राधिकारी कानून का उल्लंघन करने में 10 बार सोचते व आने वाली उनकी 7 पीढ़िया कभी भी माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेशो व निर्देशो का उल्लंघन करने के सम्बंध में सपने में भी सोचने से डरते, अर्थात माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेशों का पालन न करवा पाने का एकमात्र श्रेय माननीय उच्चतम न्यायालय के कतिपय न्यायाधिपति महोदय को ही जाता है, वे ही इसके प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है, वे इस देश के लिए प्रशंशा व साधुवाद के पात्र भी है, की कानून का पालन करा पाने की शक्तिया होते हुए भी नही करवा पा रहे है। यदि हम इस संबंध में थोड़ा चिंतन एकमात्र माननीय उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश के कतिपय अधिकारियों/ प्राधिकारियों के संबंध में करे तो इतना सटीक व ज्वलंत उदाहरण जो इस प्रकार है, क्योकि इससे अच्छा कोई और अन्य उदाहरण इस देश के संविधान व न्यायपालिका मे अवमानना के संबंध में न तो हुआ और न ही हो सकता, क्योकि यह तो आदेशो का पालन न करवा पाने के संबंध में उसकी ह्रदय तथा पवित्र आत्मा है। एक अवमानना याचिका 000781/ 2018 जो दिनांक 28/10/2017 को 5 लोगो के विरुद्ध लगाई गई थी, जिसे 02/05/2018 को माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायाधिपति महोदयद्वय श्री मैदान बी लोकुर व श्री दीपक गुप्ता जी द्वारा नियमानुसार, बिना पक्षपात के, बिना किसी भेदभाव के, किसी व्यक्ति के पद पर आसीन होने को दृष्टिगत न रखते हुए विधिसंगत व न्यायोचित रूप से निराकृत की जाती (में उनके द्वारा पारित आदेश दिनांक 02/05/2018 को खुली चेतावनी व चुनोती दे रहा हु इस संबंध में मुख्य न्यायाधिपति महोदय श्री दीपक मिश्रा जी को भी खुल पत्र लिखा गया है) तो मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में स्थिति कुछ और इस प्रकार होती व मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के कतिपय न्यायाधिपतियो /अधिकारियों व पदाधिकारियों में कानून का खोफ व भय बैठ जाता, व भविष्य में 7 पीढ़ी तक किसी नियम का उल्लंघन करने की स्थिति किसी की नही होती व स्थिति कुछ इस प्रकार की न होती, यह याचिका को खारिज करने वालो को भी अच्छी तरह से ज्ञात है, व अवमान कर्ताओं को भी अच्छी तरह ज्ञात है:- श्री मनोहर ममतानी मानव अधिकार आयोग के पद पर होने के बजाय कही और………? श्री वेदप्रकाश जी जिन्हें विधि आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है, अध्यक्ष होने के बजाय…………?श्री फहीम अनवर माननीय उच्च न्यायालय में न्यायाधीश होने के बजाय………? श्री राजेन्द्र मेनन दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति महोदय होने के बजाय………..

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? श्री हेमंत गुप्ता माननीय उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति महोदय के पद पर आसीन होने के बजाय………..? कही और होते तथा इन्हें पूर्णतः कानून का उल्लंघन करने में प्रत्यक्षतः, परोक्षतः व पूर्णतः माननीय उच्चतम न्यायालय के कतिपय न्यायाधिपतियो द्वारा उनके विरुद्ध कार्यवाही न कि जाकर उन्हें सहयोग प्रदान करते हुए, प्रश्रय प्रदान कर संसद द्वारा निर्मित न्यायालय अवमानना अधिनियम की खुली व जघन्य (मोब लीनचिंग) हत्या की गई है, जिससे कानून के प्रति समाज मे आस्था लगातार कम होती जा रही है, व कानून का भय भी बलशाली व साधन संपन्न लोगो मे कम होकर वे उसका उल्लंघन करने में कोई चूक नहीं करते, उन्हें अच्छी तरह ज्ञात है कि हमे ऊपर बचाने वाले बैठे है। यह मात्र में ही नही कह रहा हु भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधिपति महोदय श्री जे.एस.खेहर द्वारा भी कहा गया(समाचार की प्रति सलग्न) इस देश मे जो भी व्यक्ति कानून व प्रचलित विधि का खुला उल्लंघन करता है, उसका पूर्ण रूप से सम्मान किया जाता है, किन्तु जो व्यक्ति कानून के अनुसार पालन करवाने के बारे में व सत्य बात कहता है, उसे प्रताड़ित व परेशान किया जाता है। वर्तमान में उक्त उक्ति अप्रभावशाली हो रही है कि”” सत्यमेव जयते के बजाय असत्यमेव जयते”” हो रहा है।
राजेन्द्र कुमार श्रीवास-जबरन सेवा निवृत्त अपर जिला न्यायाधीश नीमच,  इस खबर में लिखी गई सभी बातों के लिये सेवानिवृत्त जज राजेंद्र श्रीवास की जिम्मेदारी होगी

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