क्या यही है मध्यप्रदेश का ‘सुशासन मॉडल’?
मध्यप्रदेश सरकार की नई आबकारी व्यवस्था ने आम नागरिकों को हैरानी में डाल दिया है। सहायक आबकारी आयुक्त, जिला भोपाल द्वारा जारी आदेश के अनुसार अब सिर्फ 500 रुपये देकर अपने निजी आवास (घर) में एक दिन के लिए विदेशी मदिरा सेवन की अनुमति ली जा सकती है। यानी अगर किसी के पास पैसे हैं, तो उसका घर ही अस्थायी बार बन सकता है।
सरकार इसे “आकस्मिक लाइसेंस (एफ.एल.-5)” कह रही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह फैसला सामाजिक जिम्मेदारी, कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक स्वास्थ्य के अनुरूप है?
कानून सबके लिए एक जैसा नहीं?
अब तक शराब सेवन को लेकर सख्त नियमों की दुहाई दी जाती रही। सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीने पर चालान, गिरफ्तारी और एफआईआर तक होती रही। लेकिन अब वही सरकार कह रही है कि 500 रुपये दीजिए और अपने घर में खुलेआम शराब परोसिए।
यह दोहरा मापदंड नहीं तो और क्या है?
पड़ोसियों की शांति का क्या?
सरकार के आदेश में यह कहीं स्पष्ट नहीं है कि:
- शोर-शराबा हुआ तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
- झगड़ा, मारपीट या घरेलू हिंसा बढ़ी तो जवाबदेह कौन?
- महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा का क्या?
एक घर में “लाइसेंस प्राप्त पार्टी” और दूसरे घर में उससे परेशान परिवार — क्या यह सामाजिक संतुलन को नहीं बिगाड़ेगा?
राजस्व के नाम पर सामाजिक नुकसान
सरकार का तर्क है कि इससे राजस्व बढ़ेगा। लेकिन सवाल यह है कि:
- क्या सरकार अब शराब को घर-घर पहुँचाने का मॉडल बना रही है?
- क्या नशा मुक्ति, सामाजिक सुधार और स्वास्थ्य पर खर्च अब सिर्फ भाषणों तक सीमित रह गया है?
जब एक ओर नशे के खिलाफ अभियान चलाए जाते हैं और दूसरी ओर घरों को ही बार बनाने की अनुमति दी जाती है, तो सरकार की नीयत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
आम आदमी बनाम व्यवस्था
आम आदमी अगर गलती से सड़क पर शराब पी ले तो अपराधी,
लेकिन पैसे वाला घर में पूरी पार्टी करे तो “लाइसेंसधारी”!
यह नीति साफ़ तौर पर दिखाती है कि कानून से ज़्यादा कीमत अब फीस की है।
निष्कर्ष
500 रुपये देकर घर को बार बनाने की अनुमति देना सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि समाज के लिए एक खतरनाक संकेत है। यह नीति न केवल कानून की आत्मा के खिलाफ है, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी से भी मुंह मोड़ती है।
अब सवाल यह नहीं है कि
“लाइसेंस कितना सस्ता है?”
सवाल यह है कि
“सरकार समाज को किस दिशा में ले जाना चाहती है?”
500 रुपये दो और अपने घर को बार बना लो —
वाह रे मोहन सरकार!
मंदिर की बात करने वाले पूरे प्रदेश को मदिरालय बनाने पर क्यों तुले हैं?

