खरी खरी
खबर पक्की: 25 जनवरी राजगढ़, राजगढ़ कलेक्टर निवेदिता द्वारा सी ए ए समर्थन रैली में भाजपा नेता को थप्पड़ जड़ना जहां गलत था। वहीं प्रदेश के 10 साल तक मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह का कलेक्टर के गलत कदम को समर्थन यह दर्शाता है कि राजगढ़ कलेक्टर पूरी तरह सत्तारूढ़ नेताओं के हाथों में खेल रही थी। उसके बाद के घटनाक्रम में कलेक्टर के थप्पड़ कांड के विरोध में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के नेतृत्व में जिस तरह भाजपा नेताओं बाबूलाल यादव, कैलाश विजयवर्गीय और खुद शिवराज सिंह आदि ने द्रौपदी के चिर हरण वाली भाषा का उपयोग महिला कलेक्टर के लिए किया, यह राजनीति और व्यवस्था को रसातल की ओर ले जाने वाला संकेत है। इसमें निश्चित तौर पर नेताओं का दोष ज्यादा है पर सरकारी कर्मचारी और अधिकारी भी कम मात्रा में दोषी नहीं है जो नेताओं के सामने साक्षात दंडवत करते रहते हैं। कलेक्टर ने भाजपा नेता को थप्पड़ मारने के पहले एक पटवारी और एक पुलिस एएसआई को भी थप्पड़ मारा था यह निश्चित तौर पर सत्तारूढ़ नेता की शह का नतीजा था। किंतु उसके बावजूद राजगढ़ पुलिस और प्रशासन ने एक आईएएस और कलेक्टर के मान सम्मान की रक्षा के लिए इस खबर को बाहर नहीं आने दिया। किंतु थप्पड़ बाज कलेक्टर की हिम्मत तो देखिए थप्पड़ कांड के बाद भाजपा के प्रदर्शन में नेताओं के अभद्र भाषा के बारे में प्रकरण दर्ज होने के बावजूद, खुद कलेक्टर द्वारा सरकारी कर्मचारियों आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को अपने समर्थन में धरना प्रदर्शन के लिए उकसाया गया और पत्रकारों के सामने रोना रो रो कर अपने को पीड़ित दर्शाने की कोशिश की यही कारण है कि एएसआई और पटवारी को थप्पड़ मारने का प्रकरण लाख छुपाने के बावजूद भी प्रकट हो गया। इस पूरे प्रकरण से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि आईएएस और आईपीएस का फील्ड पोस्टिंग साइकोलॉजिकल टेस्ट के बाद ही होना चाहिए, और यह कि प्रत्येक सरकारी कर्मचारी अधिकारी को नेताओं के हाथों में खेलने की बजाए कर्तव्य निष्ठा के साथ संविधान और कानून का पालन करना चाहिए अगर छोटा अधिकारी बड़े अधिकारी के हाथ में खेलेगा, या अधिकारी और कर्मचारी नेताओं के हाथ में खेलेंगे तो कलेक्टर हो या प्यून हश्र यही होना है कि सर छुपाने को जगह नहीं मिलेगी।
नेताओं के हाथों में खेलोगे तो कलेक्टर हो या प्यून हश्र यही होना है व IAS IPS की फील्ड पोस्टिंग के लिए साइकोलॉजिकल टेस्ट जरूरी हो।
