नई दिल्ली। 1 जुलाई शनिवार सुबह से देश में काली कमाई करने वाले चंद कारोबारियों के बुरे दिनों की शुरूआत हो रही है। जीएसटी के लॉन्च होते ही केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों को अधिक राजस्व मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
जीएसटी के प्रावधान की सबसे खास बात यह है कि यहां कारोबार का डिजिटलाइजेशन किया जा रहा है। इसे प्रभावी ढंग से करने के लिए जीएसटी में टैक्स क्रेडिट व्यवस्था बनाई गई है। इसके तहत कारोबारी को अपने प्रोडक्ट अथवा सेवा के इनवॉयस को हर महीने पोर्टल पर अपलोड करना होगा। इस इनवॉयस को कारोबारियों के सप्लायर और वेंडर के आंकड़ों से मिलाने का काम जीएसटी नेटवर्क में लगा सॉफ्टवेयर करेगा। यह मिलान सही पाए जाने पर कारोबारी को टैक्स क्रेडिट का फायदा मिलेगा।
इस नियम से देश में कारोबारियों को काले कारोबार से बाहर निकलने के लिए सिर्फ रजिस्टर्ड सप्लायर और वेंडर का सहारा लेना होगा। सप्लायर और वेंडर भी रजिस्टर्ड होने के साथ ही 20 लाख रुपये के टर्नओवर से अधिक होने पर जीएसटी के दायरे में होंगे। कारोबारियों को टैक्स क्रेडिट का फायदा लेने के लिए सिर्फ और सिर्फ रजिस्टर्ड सप्लायर और वेंडर के साथ काम करने की मजबूरी होगी नहीं तो उनके सामने ग्राहक गंवाने की चुनौती बनी रहेगी। इस कानून को और प्रभावी बनाने के लिए सरकार ने जीएसटी में जेल का प्रावधान भी किया है। इसके तहत यदि कोई कारोबारी गलत ढंग से कारोबार करता है या मुनाफाखोरी में लिप्त पाया जाता है तो उसे 5 साल की कठोर कारावास की सजा दी जा सकती है।
संसद के केन्द्रीय हॉल में जीएसटी का घंटा बजाकर देश मुनाफाखोरी करने वाले लोगों को आखिरी चेतावनी जारी कर दी गई है। चेतावनी में कहा गया है कि अब देश में काला कारोबार कर सरकार के राजस्व की चोरी करने वालों की खैर नहीं। दरअसल, संसद में जीएसटी लॉन्च के वक्त बताया गया कि देश में महज 85 लाख कारोबारी टैक्स अदा करते हैं। यानी 125 करोड़ की आबादी वाले इस देश में 1 फीसदी से भी कम लोग कारोबार पर टैक्स देते हैं। ऐसा इसलिए कि भारत एक ऐसा देश है जहां लोग टैक्स बचाने, छिपाने और चुराने के लिए दुनियाभर में कुख्यात हैं।
