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क्या ‘शांति बिल 2025’ वास्तव में शांति के लिए है या देश में ‘अशांति’ की नींव?

BySurendra Jain

Dec 27, 2025

भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित शांति बिल 2025 (SHANTI Bill 2025) को सरकार ऊर्जा क्षेत्र में “ऐतिहासिक सुधार” बता रही है, लेकिन आलोचक इसे “a-SHANTI Bill” कह रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह बिल देश की ऊर्जा ज़रूरतों और सुरक्षा के लिए है या फिर निजी कंपनियों के लिए रास्ता खोलने वाला कानून?


शांति बिल 2025 क्या है?

SHANTI का पूरा नाम बताया गया है —
Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India

सरकार का दावा है कि इस बिल का उद्देश्य:

  • परमाणु ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना
  • भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भर बनाना
  • स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) को बढ़ावा देना

लेकिन असल विवाद इस बात पर है कि इस बिल के ज़रिये परमाणु क्षेत्र में निजी कंपनियों की सीधी एंट्री का रास्ता खोला जा रहा है।


पुराने कानून क्या कहते थे?

परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962

  • परमाणु ऊर्जा पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में थी
  • निजी कंपनियों को परमाणु संयंत्र चलाने की अनुमति नहीं

न्यूक्लियर क्षति नागरिक दायित्व अधिनियम, 2010

  • किसी भी परमाणु दुर्घटना की पूरी जिम्मेदारी ऑपरेटर और सप्लायर पर
  • पीड़ितों को मुआवज़ा देने का स्पष्ट प्रावधान

शांति बिल 2025 में क्या बदला?

निजी कंपनियों की एंट्री

अब परमाणु संयंत्रों के निर्माण, संचालन और प्रबंधन में निजी कंपनियों की भागीदारी संभव हो सकती है।

दायित्व (Liability) को सीमित करना

आलोचकों के अनुसार:

  • बड़े परमाणु हादसे की स्थिति में
  • कंपनियों की जिम्मेदारी सीमित (Cap) की जा सकती है
  • वास्तविक नुकसान की भरपाई का बोझ अंततः सरकार और जनता पर आ सकता है

नियमों में “लचीलापन”

सरकार इसे “Ease of Doing Business” कह रही है,
जबकि आलोचक इसे सुरक्षा मानकों में ढील बता रहे हैं।


निजी कंपनियों को कैसे फायदा?

  1. उच्च जोखिम, उच्च मुनाफ़ा वाला सेक्टर अब निजी हाथों में
  2. दुर्घटना की स्थिति में पूरा आर्थिक जोखिम नहीं उठाना पड़ेगा
  3. सरकारी संसाधनों और जमीन तक आसान पहुंच

यही वजह है कि विपक्ष इस बिल को
“परमाणु क्षेत्र का निजीकरण” कह रहा है।


सरकार पर मुख्य आलोचनाएं

क्या सुरक्षा से समझौता हो रहा है?

परमाणु ऊर्जा में एक छोटी चूक भी फुकुशिमा या चेर्नोबिल जैसी तबाही ला सकती है।

क्या मुनाफ़ा इंसानी जान से ऊपर?

अगर निजी कंपनियों को फायदा और नुकसान सीमित है,
तो क्या वे पूरी सुरक्षा सुनिश्चित करेंगी?

क्या यह कॉर्पोरेट हितों के लिए कानून है?

आलोचकों का आरोप है कि:

  • यह बिल “सुधार” के नाम पर
  • कॉर्पोरेट लाभ को प्राथमिकता देता है

पारदर्शिता और जवाबदेही कहां?

इतने संवेदनशील क्षेत्र में:

  • स्वतंत्र नियामक
  • सार्वजनिक निगरानी
  • संसद और जनता को जवाबदेही
    अब भी सवालों के घेरे में है।

क्या यह जनता के हित में है?

समर्थकों का कहना है:

  • बिजली की बढ़ती मांग
  • कोयले से दूरी
  • स्वच्छ ऊर्जा की जरूरत

लेकिन सवाल यह है कि:
क्या ऊर्जा समाधान का रास्ता जनता की सुरक्षा से होकर नहीं गुजरना चाहिए?


निष्कर्ष

शांति बिल 2025 अगर सही सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही के बिना लागू होता है, तो:

  • यह “शांति” नहीं
  • बल्कि भविष्य में बड़े संकट की नींव बन सकता है।

सरकार को चाहिए कि:

  • बिल के हर प्रावधान पर सार्वजनिक बहस हो
  • निजी कंपनियों से पहले जनहित को प्राथमिकता दी जाए
  • और यह साफ किया जाए कि परमाणु सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा

लेकिन असल विवाद इस बात पर है कि इस बिल के ज़रिये परमाणु क्षेत्र में निजी कंपनियों की सीधी एंट्री का रास्ता खोला जा रहा है।

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