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प्रधानमंत्री आवास घोटाले में मगरमच्छो को बचाकर छोटी मछलियों पर कार्यवाही का आरोप

BySurendra Jain

Mar 29, 2019
रतलाम। प्रदेश में चर्चित रहे प्रधानमंत्री आवास योजना घोटाला के मामले में आज इस घोटाले को उजागर करने वाली श्रीमती ममता श्रीवास्तव की प्रेस
वार्ता से नया मोड़ा आ गया है। शिकायतकर्ता ममता श्रीवास्तव ने अपने अधिवक्ता अमित कुमार पांचाल की उपस्थिति में जिला कलेक्टर श्रीमती रुचिका चौहान व्दारा 19.03.19 को पारित आदेश के हवाले से प्रेस वार्ता आयोजित कर बताया कि उसकी ओर से की गई शिकायत पर कलेक्टर व्दारा दोषी नगर पालिक निगम के अधिकारियों के विरुध्द विभागीय जांच किए जाने का आदेश दे दिया जबकि वे सभी इस घोटाले के आरोपी थे। श्रीमती श्रीवास्तव ने आरोप लगाया कि जिला कलेक्टर व्दारा प्रधानमंत्री आवास योजना घोटाले की एफआईआर दर्ज होने के बाद भी ऐसा आदेश पारित किया गया, जो निश्चित रुप से नगर निगम के अधिकारियों को बचाने के लिए किया गया है।
शिकायतकर्ता की शिकायत जिसमें उसके व्दारा नामजद व नगर पालिक निगम रतलाम के अधिकारियों के विरुध्द जांच कर उनके विरुध्द अपराध दर्ज किए का निवेदन किया और जिस पर करीब 13 लाख रुपयों के प्रधानमंत्री आवास घोटाले का खुलासा हुआ, ममता ने आरोप लगाया कि जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक व्दारा कोई कार्यवाही न करते हुए  मनमानी जांच कर मात्र एक कम्प्यूटर ऑपरेटर के विरुध्द अपराध दर्ज करवा दिया गया। नगर पालिक निगम रतलाम के
अधिकारियों को जो उक्त घोटाले के लिए प्रत्यक्ष रुप से जिम्मेदार थे, को जिला कलेक्टर व पुलिस अधीक्षक व्दारा  बचाने का प्रयास किया गया और जिस एक कम्प्यूटर ऑपरेटर के विरुध्द अपराध दर्ज किया गया, जिसे गिरफ्तार किया गया है। इसके अतिरिक्त एक अन्य युवक जाकिर हुसैन व शाहिद को गिरफ्तार किया गया है जिसमें से शाहिद की जमानत हो चुकी है।  जिस व्यक्ति के विरुध्द शिकायत की गई उसने ही जांच कर स्वयं को निर्दोष बताकर
अन्य को दोषी करार दिया ।
        नगर पालिक निगम के कार्यपालन यंत्री सुरेशचन्द्र व्यास ने एक मात्र हितग्राही मधु के सम्बन्ध में उल्लेख किया और उसे आधार बनाकर दीपक कुमावत
को मुख्य आरोपी बताया जबकि मधु के अलावा अन्य 12 हितग्राहियों से कोई चर्चा नहीं की गई और न ही घटना के सम्बन्ध में उन्हें जांच में शामिल किया गया। इसके अतिरिक्त जिस मधु के कथन के आधार पर दीपक के विरुध्द एफआईआर दर्ज करवाई गई उस मधु के नाम उन 13 पात्र व्यक्तियों की सूची में ही शामिल नहीं है जिनके नाम की राशि फर्जी तरीके से निकाली गई।
सुरेशचन्द्र व्यास ने घटनाक्रम के सम्बन्ध में किस अधिकारी के कहने से जांच की गई और अपात्र लोगों से वापस राशि जमा करवाई गई यह तथ्य छुपाया
गया। सुरेशचन्द्र व्यास ने अपने जांच प्रतिवेदन में यह भी बताया है कि – सेडमेप कम्पनी व्दारा जिन हितग्राहियों के बैंक  खाता सम्बन्धी जानकारी पूर्ण होती है उन हितग्राहियों की सूची बनाई जाती है तथा इस सूची पर निगम के इंजीनियर, एजिस कम्पनी के असिस्टेंट रेजीडेन्ट इँजीनियर तथा सेडमेप कम्पनी के हस्ताक्षर होकर सूची भुगतान सम्बन्धी कार्यवाही हेतु नगर निगम के लेखा विभाग में प्रस्तुत की जाती है तथा इसी सूची पर सक्षम स्वीकृति उपरांत ऑडिट से भुगतान वाउचर पारित होने पर हितग्राहियों के खातों में किश्त की राशि अन्तरित की जाती है। इस प्रतिवेदन से सक्षम स्वीकृति देने वाले अधिकारी-कर्मचारी का नाम गायब कर दिया गया और  इस सूची पर हस्ताक्षर करने से पहले इन सक्षम स्वीकृति देने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों के कारनामों को जानबूझकर जांच प्रतिवेदन में छुपाया गया क्योंकि उक्त सक्षम स्वीकृति देने वाले अधिकारी नगर पालिक निगम और जिला प्रशासन से सम्बन्धित हैं, जिन्होंने निगम की सूची और स़़़ेडमेप व्दारा भेजी गई सूची का मिलान नहीं किया और जानबूझकर फर्जी सूची को स्वीकृत किया। जांच प्रतिवेदन के साथ संलग्न सूची जिसमें मूल सूची और सेडमेप कर्मचारियों की सूची में
उल्लेखित 13 व्यक्तियों के नाम लिखे गए हैं, में कहीं भी मधु पति कालूराम का नाम उल्लेखित नहीं है, इस मधु को केवल दीपक कुमावत को आरोपी बनाने के
लिए जांच में शामिल किया गया जबकि जांच में शामिल होने वाले वास्तविक मूल 13 हितग्राहियों से कोई पूछताछ किए जाने का उल्लेख जांच
प्रतिवेदन में नहीं किया गया है। जांच प्रतिवेदन के साथ 13 पात्र लोगों को जिस सूची को शामिल किया गया है उसमें क्रमांक 105 पर जायदा पति हजमत
का नाम  ममता श्रीवास्तव के नाम के आगे लिखा गया है न कि मधु पति कालूराम का।शिकायतकर्ता ने बताया कि उसने पूरे मामले की जांच के लिए हाई कोर्ट इंदौर में याचिका लगाई है और आज मुख्यमंत्री को भी शिकायत कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निवेदन किया है

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