इंदौर। बास्केटबॉल कॉम्प्लेक्स में आयोजित तीन दिवसीय दीक्षा महोत्सव के तहत शनिवार को धैर्य कुमार को आचार्य के सानिध्य एवं हजारों लोगों की मौजूदगी में दीक्षा दी। दीक्षा लेने के बाद धैर्य कुमार का नामकरण भी हुआ। जिसमें आचार्य श्री ने नया नाम मुनि धरणेन्द्र सुंदर विजय जी महाराज दिया। इस दीक्षा महोत्सव का साक्षी समग्र जैन समाज रहा। दीक्षा महोत्सव में आचार्य श्री ने प्रवचनों की अमृत वर्षा भी की। जिसका लाभ सभी श्रावक-श्राविकाओं ने लिया। शनिवार का दिन मुमुक्षु धैर्यकुमार और उसके परिवार के लिए महत्वपूर्ण रहा। क्योंकि वक़्त था मुमुक्षु धैर्यकुमार की दीक्षा का। सुबह से ही समाजजन बास्केटबॉल कॉम्प्लेक्स पहुंच गए थे। सुबह करीब 6.45 बजे से मुमुक्षु धैर्यकुमार की दीक्षा विधि शुरू हुई। करीब एक घंटे से ज्यादा देर तक दीक्षा विधि चली। जिसमें केश लोचन, नए वस्त्र धारण करवाए गए।
बड़ी संख्या में जैन समाज के लोग बास्केटबॉल कॉम्प्लेक्स में मौजूद थे। इंदौर के साथ ही मुंबई से भी बढ़ी संख्या में समाज के लोग यहां आए। साधारण वस्त्र में धैर्य कुमार महाराज के पास बैठा था। वहीं स्टेज के समीप उसके माता पिता भी मौजूद थे। बेटे की दीक्षा विधि के दौरान माता पिता के चेहरे पर भी खुशी का भाव देखने को मिला।
छह साल पहले 14 साल की उम्र में बड़े भाई प्रभव ने भी दीक्षा ली थी। अब वे जैन मुनि पार्श्व सुंदर विजयजी के रूप में पहचाने जाते हैं। मुनि पार्श्व सुंदर विजयजी का कहना है कि मेरे सांसारिक परिवार में माता-पिता और हम दो भाई हैं। पिता चेतनभाई शाह और माता मैना शाह हैं। पिता का भवन निर्माण के लिए प्लास्टर पावडर के सप्लाय का काम है। उन्होंने मेरी दीक्षा के समय भी आपत्ति नहीं ली थी और न ही धैर्य की दीक्षा से उन्हें कोई आपत्ति थी।
आठवीं तक सांसारिक शिक्षा ले चुका धैर्य कहता है कि उसका घर और खेल-कूद में मन नहीं लगता। उसे गुरु के साथ स्वाध्याय, पैदल विहार और साधु जीवन में ही आनंद आता है, इसलिए कई बार गुरु से निवेदन करने के बाद अब उनसे दीक्षा की आज्ञा मिली और आज वो वैराग्य की राह पर बढ़ गया।
