खबर पक्की: चुनाव आचार संहिता लगने के बाद आम आदमी का जीना दुश्वार हो गया है। अभी दीपावली और शादी विवाह की तैयारियों के लिए खरीदी का मौसम है। जिले के ग्रामीण इलाकों से फसल बेचने के बाद शादी विवाह और त्यौहार की खरीदी के लिए ग्रामीण जन रतलाम आते हैं। घटना दुर्घटना में घायल या बीमारी से त्रस्त आदमी भी इलाज के लिए रतलाम ही आता है और प्रायः लाख ₹ 2 लाख की नकदी उनके पास होना मामूली बात है। ऐसे में पुलिस और प्रशासन की जगह जगह तैनात टीमें आचार संहिता के नाम पर आतंक का पर्याय बन गई है। चुनाव आयोग के निर्देशों का हवाला देकर ₹50000 से ज्यादा नकदी बरामद होने पर नकदी जप्त कर नोटिस देकर जवाब मांगा जाता है। और जवाब संतोष प्रद होने पर ही पैसा वापस लौटाने की एक प्रक्रिया है। आज जब आप डिजिटल इंडिया की बात कर रहे हो लगभग प्रत्येक आदमी का आधार बना चुके हो तब ₹50000 से ज्यादा किसी आदमी के पास पाए जाने पर जप्त कर और नोटिस देकर जवाब मांगने की प्रक्रिया हास्यास्पद लगती है। होना यह चाहिए यदि ₹50000 से ज्यादा किसी आदमी के पास पाया जाए और यदि आपको लगता है कि वह संदिग्ध है तो उसके पूरे दस्तावेज जिसमें आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, आई कार्ड शामिल है के आधार पर उसकी पहचान सुनिश्चित कर उसके पास बरामद राशि अंडरटेकिंग लेकर उसे ही वापस कर देना चाहिए और जवाब देने के लिए उसे पर्याप्त समय दे देना चाहिए ताकि किसी आवश्यक कार्य इलाज या मांगलिक कार्य से जा रहे व्यक्ति को परेशानी ना हो। यह इस देश की विडंबना है कि सभी ताकतवर एजेंसी और सत्ता का जोर सिर्फ आम आदमी के ऊपर ही चलता है विजय माल्या नीरव मोदी मेहुल चौकसी जैसे लोग अरबों खरबों के लोन लेकर फरार हो जाते हैं 10 दिन पहले निर्मित कंपनी को हजारों करोड़ का काम मिल जाता है आम आदमी ₹50000 से ज्यादा लेकर निकले तो आचार संहिता के नाम पर आतंक फैलाया जाता है हर मेहनत कश ईमानदार आदमी को ही क्यों चोर समझा जाता है इस देश में। देश की बैंकों का 12 लाख करोड़ का एनपीए का 85 परसेंट पैसा मात्र 4500 लोगों के पास में है। लेकिन उनकी संपत्तियों को नीलाम करने की ताकत सरकारी का रिंदों के पास नहीं है। लेकिन दो चार लाख का लोन लेकर खेती के लिए ट्रैक्टर खरीदने वाले किसान का ट्रैक्टर नीलाम करने के लिए यह लोग पहुंच जाते हैं। चुनाव आयोग को यह समझना होगा कि छोटे दुकानदार मध्यम दुकानदार किसान आदि को आचार संहिता के नाम पर परेशान ना किया जाए आचार संहिता के नाम पर मेले की दुकानों को जल्दी बंद करवाना स्टेशन की होटलों को बंद करवाने से बाहर से आने वाले लोगों को कितनी परेशानी होती है यह वही समझ सकता है जो भुगतता है। अपना परिवार पालने के लिए मेले में किराए से दुकान लेकर धंधा करने वाले लोग आचार संहिता के डर से सहमे हुए हैं उन्हें लगता है कि इस मेले से कमाना तो दूर जो पैसे किराए और स्थापना में लगे हैं वह निकल आए तो ही गनीमत है। चुनाव आयोग को पुलिस और प्रशासन को स्पष्ट निर्देश देना चाहिए कि आचार संहिता से आम आदमी को बिल्कुल भी परेशानी नहीं होना चाहिए जो लोग राजनीति से जुड़े हुए हैं अपराध से जुड़े हुए हैं उनमें अगर खौफ है तो ही आचार संहिता मानी जाएगी। लेकिन जो व्यवस्था आम आदमी में खौफ पैदा करें तो यह आतंक संहिता में तब्दील हो जाएगी।
