ख़बरपक्की:असहाय व आरक्षित वर्ग द्वारा अवमानना करने पर सोमोटो संज्ञान लेकर 3 माह में निराकरण कर दंडादेश पारित, किन्तु सामान्य व प्रभावशाली वर्ग द्वारा अवमानना करने व याचिका पेश करने के बावजूद 11 माह तक प्रकरण प्रारंभिक सुनवाई हेतु नियत नही”” दुर्भाग्य इस विशाल प्रजातांत्रिक भारत देश मे न्याय के विशाल व भव्य मंदिर माननीय उच्चतम न्यायालय को माननीय उच्चतम न्यायालय के कतिपय न्यायाधीशों द्वारा कतिपय मामलों में कमजोर व नपुंसक बनाये जाने का खुला प्रयास किया जा रहा है। जिसके कारण कानून के पालन व क्रियान्वयन किये जाने में पक्षपात व दोहरा रवैया अपनाए जाने से निरन्तर असंतोष व्याप्त होता जा रहा है, किन्तु अवमानना के डर के कारण कोई भी सामान्य नागरिक कहने का प्रयास नही कर पाता है, इसका तात्पर्य यह नही की कोई संस्था अथवा व्यक्ति प्रचलित विधि व कानून का उल्लंघन कर उसका दुरूपयोग करे। माननीय उच्चतम न्यायालय में सर्वप्रथम जस्टिस श्री कर्णन व जस्टिस श्री मार्कण्डेय काटजू का वर्ष 2017 में किये गये अवमानना का का ही उदाहरण ले, तो जस्टिस कर्णन को अवमानना करने पर उक्त मामले में मात्र 3 माह एक दिन में अवमानना याचिका की सुनवाई पूर्ण कर 6 माह के कारावास की सजा दी गई थी, उसी वर्ष में दिनांक 06/01/2017 को जस्टिस मार्कण्डेय काटजू जी द्वारा अवमानना करने के संबंध में क्षमा याचना करने पर उन्हें माफी प्रदान की गई थी। जबकि अवमानना के संबंध में जस्टिस कर्णन द्वारा भी लिखित में माफी मांगी गई थी, किन्तु उन पर प्रावधान में वर्णित पूरी अधिकतम सजा दी गई थी, हालांकि उक्त विवेकाधिकार उन्हें प्राप्त है, किन्तु जब असहाय/ सामान्य वर्ग व आरक्षित वर्ग की बात इस देश व मध्यप्रदेश न्यायपालिका में होती है, तो पक्षपात स्पष्ट, खुला व परिलक्षित दिखाई देता है।। इसी तरह पक्षपात का खुला उदाहरण अवमानना याचिका 781/2018 में भी खुला दिखाई देगा, उक्त अवमानना याचिका 1. माननीय उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति महोदय श्री हेमंत गुप्ता, 2. माननीय उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधिपति महोदय श्री राजेन्द्र मेनन, 3. माननीय उच्च न्यायालय के तत्कालीन रजिस्ट्रार जनरल श्री वेदप्रकाश शर्मा, 4. माननीय उच्च न्यायालय के तत्कालीन रजिस्ट्रार जनरल श्री मनोहर ममतानी 5. माननीय उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल श्री फ़हीम अनवर के विरुद्ध दिनांक 28/10/2017 को पेश किये जाने पर उसकी काफी जद्दोजहद व मशक्कत करने के बाद उसकी सुनवाई दिनांक 02/05/2018 को की जाकर उसे बड़ी साफगोई से माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायाधिपति महोदय श्री मदन बी. लोकुर व श्री दीपक गुप्ता जी द्वारा उसे निराधार व बेबुनियादी आधारों पर प्रारंभिक सुनवाई में ही याचिकाकर्ता को बिना सुने खारिज कर निम्न आदेश दिया गया की:-” We have heard the petitioner in person.We find no merit in the contempt petition.The contempt petition is accordingly dismissed. क्या माननीय न्यायाधिपति महोदय इस देश के नागरिकों व जनता को अनपढ़ व मूर्ख समझकर इस तरह का आदेश कर रहे, (माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अपने कई निर्णयों में कहा गया है कि प्रत्येक आदेश well reasoned व speaking order होना चाहिए, क्या इस आदेश में उक्त तथ्य दिखाई देकर कथनी व करनी में स्पष्ट अंतर नही दिखाई दे रहा है) न्यायालय अवमानना क्या होती है, और किस तरह आवेदन पेश होने पर निराकरण किया जाता है, यह मुझे भी व विधि का सामान्य ज्ञान रखने वालों को अच्छी तरह से विदित व ज्ञात है। यदि इस तरह किसी आवेदन, वाद व प्रकरण का निराकरण अधीनस्थ न्यायालय में बिना सुने मनमाने रूप से किया जावे, तो समाज मे अराजकता व अशांति फैल हो जावेगी। जबकि माननीय उच्च न्यायालय द्वारा आदेश का पालन करने से स्पस्ट इंकार करने/अवमानना के संबंध में समस्त दस्तावेज याचिका के साथ पेश किए गए, व माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेश का पालन न होने के उपरांत अवमानना कैसे नही, यह बड़ा हास्यास्पद है, जैसे उन्हें रात में सपना आया हो, की अवमानना नही हो रही है, दूसरे दिन जाकर याचिका खारिज कर दी गई, ऐसा भी नही हुआ। इस मामले में कम से कम विपक्षी से सूचना पत्र जारी कर पूछना तो चाहिए कि आप हमारे आदेश का पालन क्यो नही कर रहे है, किन्तु उक्त न्यायाधिपतियो द्वारा सम्पूर्ण न्यायप्रणाली व न्याय तथा सत्य एवम वास्तिवकता की हत्या कर उसे दफन किया गया है, जिसके लिए भगवान व इतिहास उन्हें कभी माफ नही करेगा, तथा इस मनमाने आदेश हेतु वे अविस्मरणीय याद किये जाते रहेंगे। उनके द्वारा पक्षपात व दोहरा रवैया सामान्य व आरक्षित वर्ग तथा प्रभावशाली व प्रतिष्ठित वर्ग के लोगो के संबंध में अपनाए जाने के संबंध में उदाहरण माननीय उच्चतम न्यायालय से लेकर माननीय उच्च न्यायालय तक देखने को मिलेंगे।। दूसरी एक और अवमानना याचिका 856/2018 माननीय उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति महोदय श्री हेमंत गुप्ता व माननीय उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल श्री फ़हीम अनवर व अन्य के विरुद्ध दिनांक 28/10/2017 से लंबित होकर जानबूझकर माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश दिनांक 21/03/2002 का पालन 16 वर्ष से निरंतर नही करने के संबंध में लंबित है, (सलग्न प्रति आदेश की-1) जिसका पालन नही करने के संबंध में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत वर्ष 2016 व दिनांक 07/10/2017 को यह स्पष्ट लिखकर भी दिया गया (सलग्न प्रति आदेश की-2 व 3) की इस संबंध में अभी तक कोई नियम निर्मित नही किये गए है, उसके बावजूद भी लगभग 11 माह तक याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई इसी कारण नही की जा रही कि प्रतिष्ठित व बलशाली अवमानकर्ताओ को बचाया जा सके।। तृतीय अवमानना याचिका जो कि डायरी नम्बर 40425/2017 दिनांक 11/12/2017 को माननीय उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति महोदय श्री हेमंत गुप्ता व माननीय उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल श्री फ़हीम अनवर के विरुद्ध प्रस्तुत की गई, उस संबंध में इतनी लापरवाही व पक्षपात किया जा रहा है, की रजिस्ट्री द्वारा 9 माह के उपरांत भी उसमे क्या डिफेक्ट है, वह नही बताये जाकर सुनवाई नही की जा रही है, झूठा शपथपत्र यदि किसी कार्य के संबंध में किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा पेश कर दिया जावे तो, उस पर पूरी सुप्रीम कोर्ट के कतिपय न्यायाधिपति महोदय टूट पड़ेंगे, किन्तु यदि कतिपय असहाय व सामान्य वर्ग के द्वारा आदेशो की अवमानना की जाती है, तो उन पर कोई कार्यवाही नही की जाकर उन्हें किस तरह बचाना है, इसके रास्ते निकाले जाकर येनकेन अवमानना याचिका खारिज व लंबित रखी जाती है, जबकि स्वयं माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अपने निर्णय AIR 2016 SC 345 में जस्टिस श्री मदन बी.लोकुर व जस्टिस श्री आर .के.अग्रवाल द्वारा स्पष्ट कहा गया है कि ” झूठा शपथपत्र प्रस्तुत किया जाना बुराई है, जिसे प्रभावी ढंग से और कड़ाई से प्रतिषिद्ध किया जाना चाहिए, यदि जानबूझकर झूठ कहा गया है, तब दोषी व्यक्ति को अभियोजित करने का आदेश देते हुए दंडित करना चाहिए। इसी तरह अन्य निर्णय AIR 2011SC 1645 में जस्टिस श्री सथाशिवम व जस्टिस श्री गोखले द्वारा कहा गया की “”गैर जिम्मेदाराना अभिकथनो को उसके सत्यता पर सम्मान दिए बिना, प्रस्तुत करने की प्रवृति को हतोत्साहित करते हुए शपथपत्र की पवित्रता को सरंक्षित किया जाना चाहिए। झूठा शपथपत्र पेश करने वाले पर 10 लाख जुर्माना किया गया।”” यदि इस तरह के आदेश पारित किए गए है, तो उल्लंघन करने वालो पर कार्यवाही करने में भय किस बात का है, या फिर खुले रूप में कहा जावे की उन्हें बचाया क्यो जा रहा है, जबकि झूठा शपथपत्र वर्ष 2011 में माननीय उच्च न्यायालय के प्राधिकारियों द्वारा पेश करने के बाद अभी तक उसका पालन न्यायाधीशों के हितार्थ नही किया गया तथा वे न्याय हेतु निरंतर भटक रहे है। और तो और याचिका पेश करने पर उसे 9 माह से टाला क्यो जा रहा है, इस बात का कोई भी जवाब माननीय रजिस्ट्री के पास नही है। क्या इस संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति महोदय कुछ कहेंगे, या फिर मौन धारण किये रहेंगे, दुर्भाग्य है कि मेरे पास तो अपनी समस्या रखने का और कोई फोरम भी नही है, पत्र लिखकर भेजने पर भी महोदय द्वारा कोई कार्यवाही नही की जाती है। ये भेदभाव व अपने वाले अर्थात अवमानकर्ताओ को बचाने की प्रवर्ती न्यायपालिका में बन्द होंना चाहिए, या फिर न्यायालय अवमानना अधिनियम 1971 में संशोधन कर स्पष्ट प्रावधान कर देना चाहिए कि सामान्य वर्ग व मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के प्राधिकारियों पर अवमानना करने के संबंध में यह अधिनियम लागू नही होगा, जिससे कोई अवमानना के संबंध में याचिका पेश न करे। यह तभी बंद होगा जब आरक्षित वर्गों का प्रतिनिधित्व माननीय उच्चतम व उच्च न्यायालय में होगा, अन्यथा मनमानी व भेदभाव और बढ़ता जावेगा, तथा आरक्षित दबे कुचले वर्ग के लोगो का शोषण और किया जाता रहेगा। इन घटनाओं से माननीय सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज महोदय श्री बी.आर.कृष्ण अय्यर द्वारा वर्ष 1976 में एक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में दिया गया वक्तव्य याद आता है, कि “कानून भोंकता सब पर है, लेकिन काटता केवल गरीबों, बेबसों, अनपढों और अनभिज्ञ लोगों को हैं”(संलग्न समाचार की प्रति-4) इसमें भविष्यवर्ती घटनाओ को दृष्टिगत रखते हुए, यह भी समाविष्ट किया जाना चाहिए कि अब भौकना भी बंद कर दिया है, या फिर मुह देखकर भोका जाता है, जो व्यक्ति भविष्य में कुछ बिगाड़ सकता है, उस पर भोका नही जावेगा, उसी पर भोका जावेगा, जो निर्बल व असहाय हो। जिस तरह इन प्रस्तुत अवमानना याचिकाओं में लगातार साशय पूर्वक किसी षडयंत्र के तहत किया जा रहा है। इन लंबित याचिकाओं की दुर्दशा देखकर ऐसा लगने लगा कि कतिपय लोग माननीय उच्चतम न्यायालय में बैठकर न्याय का उपहास व मज़ाक कर रहे है जय हिंद जय भारत।। राजेन्द्र कुमार श्रीवास। जबरन सेवा निवृत्त अपर जिला न्यायाधीश नीमच 9425485815
