खबर पक्की: जी हां रतलाम शहर में कुत्तों की बढ़ती तादाद को देखते हुए यह हैडिंग बिल्कुल सही फिट बैठता है यहां रोज रोज हर मोड़ मोड़ पर देखे जाते हैं कुत्ते यह ऊपर का फोटो जो आप देख रहे हैं 20 अगस्त की ।सुबह 8:30 बजे कोर्ट के ठीक सामने का फोटो है और इन कुत्तों के डर से साइकिल सवार गिरते-गिरते बचा है शांति समिति की मीटिंग में भी इस मुद्दे को उठाया गया था कलेक्टर ने बहुत बार वार्निंग दी पर लगता है बहुत ही चिकने घड़े के बने हुए हैं नगर निगम के कर्मचारी और जनप्रतिनिधि तभी तो कलेक्टर के इतने वार्निंग देने के बावजूद कुछ असर नहीं होता और रतलाम शहर की जनता इतना संतोषी है कि कितना भी इनको कुत्ते काट ले कुत्तों की वजह से मर जाए दुर्घटनाएं हो जाए लेकिन कोई आदमी सड़क पर उतरने के लिए तैयार नहीं ऐसा लगता है बिल्कुल मुर्दों का शहर है कब जागेंगे शहर के लोग कब अपने हकों के लिए सड़कों पर उतरेंगे जिस शहर के लोग अपने हक के लिए सड़क पर नहीं उतरेंगे उस शहर की तरक्की कब और कैसे मुमकिन है यही कारण है कि निरंतर बढ़ती आबादी के बावजूद शहर की ट्रैफिक व्यवस्था बढ़ता अतिक्रमण बढ़ते मवेशी और कुत्तों की फौज इस शहर को बर्बाद करने पर तुली हुई है जिस महापौर को हमने यह सोच कर चुना था की चलो उच्च शिक्षित और डॉक्टर है शहर का कुछ अच्छा होगा लेकिन शहर बद से बदतर होता जा रहा है और डॉक्टर साहिबा को शहर की जरा भी चिंता नहीं है ऐसा प्रतीत होता है शायद उन्हें अपनी पार्टी की भी चिंता नहीं है कि कैसे अगले चुनाव में वोट मिलेगे क्योंकि पूरे कार्यकाल के दौरान किसी भी कार्य को लेकर शहर के प्रति उनकी गंभीरता अभी तक नजर नहीं आई है यही कारण है कि जो शहर उन्हें विरासत में मिला था उससे ज्यादा बदतर स्थिति में आज है।अब तो भगवान ही इस शहर को शहर बना सकते हैं।
