न्यायाधीशों व सरकारी कर्मचारियों/ अधिकारियों सावधान सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन प्रस्तुत किये जाने व व्हिसल ब्लोअर प्रोटेक्शन एक्ट 2011 के तहत शिकायत किये जाने को अनिवार्य सेवानिवृति किये जाने में आधार बनाया जा सकता है””?
भारतीय संसद व माननीय उच्चतम न्यायालय को सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 व व्हिसल ब्लोअर प्रोटेक्शन एक्ट 2011 को माननीय उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश के संबंध में तत्काल प्रभाव से अवैध व प्रभाव शून्य घोषित कर देना चाहिए क्योंकि माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत किसी अधिकारी/ कर्मचारी द्वारा आवेदन पत्र प्रस्तुत किये जाने को भी अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आधार बनाया जा सकता है(नोटशीट की प्रति सलंग्न) माननीय उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश के मुख्य न्यायाधिपति श्री “”हेमंत गुप्ता “” व इस कार्य मे लगी उनकी सहयोगी टीम की सोच व उनकी संकुचित घटिया विचारधारा पर हंसी व आश्चर्य होता है कि इतने बड़े उच्च पदों पर विराजमान लोगों की संकुचित व घटिया सोच है कि वे निराकरण किस बिंदु का कर रहे हैं व किस बिंदु पर निष्कर्ष अवधारित कर रहे हैं पता नहीं कैसे इन कतिपय लोगों को माननीय उच्च न्यायालय में न्यायाधिपति महोदय बनाया गया है। अभिवचन व किसी प्रकरण का यह सिद्धांत है कि जो बिंदु किन्हीं पक्षकारों के बीच विवादित है उसी का निराकरण कर उन पर निष्कर्ष देना होता है जबकि किसी कर्मचारी/ अधिकारी के प्रकरण में अनिवार्य सेवानिवृत्ति किये जाने के संबंध में जिन बिंदुओं पर विचार करना चाहिए था, वे अनिवार्य सेवा निवृति के संबंध में पूर्ण नही हो पा रहे थे, उन पर विचार नही किया गया। एक विचाराधीन प्रकरण की साक्ष्य जिसमे विवादित किसी बिंदु का निराकरण किया जा रहा है, उसे दूसरे अन्य लंबित वाद जिसमे विवादित बिंदु कोई दूसरा है, उसे कैसे विचार में लिया जा सकता है। अनिवार्य सेवा निवृति के सिद्धांत के पहलुओे के संबंध में विचार करने के सिद्धांतों में यह कही लेख नही है कि सूचना का अधिकार अधिनियम व व्हिसल ब्लोअर प्रोटेक्शन एक्ट 2011 के तहत शिकायत किये जाने पर उसे भी विचार में लिया जाकर अनिवार्य सेवानिवृति की जावेगी। इस तरह से अनिवार्य सेवा निवृति कर भय व आतंक का जंगलराज स्थापित करने का प्रयास किया गया है कि कोई भी न्यायिक अधिकारी मध्यप्रदेश में अपने अधिकारों के संबंध में अपनी जायज मांगो के संबंध में आवाज न उठावे, तथा रजिस्ट्री के कतिपय अधिकारी अपने मनमाने, अवैध व अनियमित कार्य विगत कई वर्षों से कर रहै है व करते रहे, अन्याय व पाप ज्यादा दिन नही टिकता, एक न एक दिन उसका खात्मा निश्चित रूप से होता है, तथा वह समय अब ज्यादा दूर नही रहा है। प्रार्थी द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत “”कुल 33 आवेदन पत्र “”( जिससे कई अनियमित, मनमाने तथा अवैध कार्यो की पोल खुली है) प्रस्तुत किये जाने को व व्हिसल ब्लोअर प्रोटेक्शन एक्ट 2011 के तहत की गई शिकायत (जिसका निराकरण करने की हिम्मत अभी तक माननीय उच्च न्यायालय के किसी अधिकारी की नही हुई व किसी की भी नही हो पावेगी) को आधार बनाते हुए अनिवार्य सेवानिवृत्ति की गई है। व्हिसल ब्लोअर प्रोटेक्शन एक्ट 2011 के तहत भारतीय संसद द्वारा प्रत्येक व्यक्ति व नागरिक को पारदर्शी प्रशासन हेतु प्रशासनिक अधिकारियों के मनमाने व स्वेच्छापूर्वक किये जाने वाले कार्यो पर अंकुश लगाए जाने हेतु शिकायत करने का महत्वपूर्ण व अभूतपूर्व अधिकार दिया गया। संसद द्वारा निर्मित कानूनों की अवमानना माननीय उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश द्वारा खुले रूप से की जाकर अधिनियम व जनता की भावनाओ का मखोल व मज़ाक उड़ाया जा रहा है, यह सही है कि इस देश मे न्यायपालिका सर्वोच्च है, इसका तात्पर्य यह भी नही की वह उस निर्मित व अस्तित्व में रहते हुए कानून को अवैध व प्रभाव शून्य घोषित किये बिना उसका खुला उल्लंघन कर लोकतंत्र में जनमानस की खुली हत्या मनमाने रूप से करे। वैसे तो माननीय उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति महोदय को तो नैतिकता के आधार पर अपने पद पर एक क्षण भी रहने का कोई अधिकार नही है, फिर भी पद को धारण किये हुए है, यदि ऐसा मामला राजनैतिक क्षेत्र में किसी महान व बड़े से बड़े राजनीतिज्ञ का होता तो शायद उसे अपना त्यागपत्र तुरंत जांच प्रारम्भ होते ही देना पड़ता, जबकि जांच प्रारम्भ हुए 3- 4 वर्ष हो चुके, यह कोंन सी जांच है जो समाप्त ही नही हो रही या होने नही दी जा रही है…..? (दुसरो को जांच लंबित रहने के दौरान सजा-ए-मोत यह कोन से न्याय है माननीय गुप्ता जी सोचिए विचार कीजिये) किन्तु मामला न्यायपालिका से जुड़ा होने से कोई कह नही पा रहा है, यहां तक कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी जो अपनी बेबाक बुलंद आवाज के लिए जाना व पहचाना जाता है, तथा कई दिग्गज व दबंग पत्रकार महोदय है, वह भी कहने व लिखने की हिम्मत नही कर पा रहै है। भारत मे ऐसा भी कोई कानून नही होना व बनना नही चाहिए जो माननीय उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश के कतिपय न्यायाधिपति महोदय के अवैधानिक, अनियमित व अवैध कार्यो में हस्तक्षेप करे। किसी व्यक्ति या नागरिक द्वारा शिकायत करने व आवेदन प्रस्तुत करने पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति मनमाने रूप से विचार में लेकर अवैधानिक रूप से की जावे, यह कोंन सा प्रजातांत्रिक व्यवस्था में जंगल राज स्थापित हो रहा है..………..?
राजेन्द्र कुमार श्रीवास
जबरन सेवानिवृत न्यायाधीश नीमच
9425485815
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