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डॉक्टर महापौर के राज में आईसीयू में रतलाम शहर

BySurendra Jain

Sep 20, 2017

संपादक khabarpakki.com

रतलाम।  पिछले नगर निगम चुनाव में जब भाजपा ने डॉक्टर सुनीता यार्दे को रतलाम शहर से महापौर का उम्मीदवार बनाया तो लोगों को बड़ी आशा थी इस शहर को इतना पढ़ा-लिखा महापौर मिल रहा है तो कुछ अच्छा होगा लेकिन पूरे कार्यकाल को देखें तो सिवा निराशा के कुछ हाथ नहीं लगता है।चारों तरफ फैली गंदगी, उखड़ी हुई सड़के, पार्किंग के अभाव में जाम सड़के और रेंगता हुवा यातायात, शहर के अनेक क्षेत्रों में पानी की किल्लत टूटी फूटी नालिया बंद स्ट्रीट लाइटें हरियाली को तरसते बगीचे ध्वस्त हो चुका नेहरू स्टेडियम इस शहर की कहानी खुद बयां कर रहे हैं। पिछले 3 सालों में संपत्ति कर जल कर और नगर निगम के समस्त करो मैं वृद्धि कर दी गई है उसके बावजूद जनता की सुविधाओं में कोई इजाफा नहीं हुआ है भ्रष्टाचार अपने चरम पर है नगर निगम में कोई भी काम बगैर पैसे के नहीं होता है कुल मिलाकर जिन सपनों को देखते हुए रतलाम शहर की जनता ने रतलाम महापौर को चुना था  वह सारी आशाएं और अपेक्षाएं आसमान से पाताल में पहुंच गई है। नगर निगम बनने के बाद आज तक जितने महापौर बने हैं चाहे जयंतीलाल जैन पोपी हो, पारस सकलेचा हो, आशा मोर्य हो या शैलेंद्र डागा हो तुलनात्मक रुप से वर्तमान महापौर से इन सभी का कार्यकाल बेहतर रहा है। ऐसा जनता का मानना है लेकिन हमारा मानना है कि शहर का बंटाधार करने के लिए महापौर जितनी दोषी है उतने ही दोषी शहर की जनता, वर्तमान परिषद, नाकारा विपक्ष और आयुक्त व उनकी टीम है। जनता इसलिए दोषी है कि चुनने के बाद 5 साल तक सुध नहीं लेती है कि शहर में क्या चल रहा है।  परिषद इसलिए दोषी है कि शहर के विकास की जिम्मेदारी निभाने में असफल साबित हो रही है। नाकारा विपक्षी इसलिए दोषी है क्योंकि जनता की आवाज को ताकत से नहीं उठा पा रहा है और निगम आयुक्त व उनकी टीम इसलिए दोषी है क्योंकि दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की(खुद की) से फुर्सत मिले तो विकास के कार्यों को देखें।

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