खबर पक्की: एक नोजवान जिसका 22 साल की उम्र में लंदन की किसी कम्पनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के पद पर नॉकरी का बुलावा आता है वह जाने के लिये दिल्ली पहुँच जाता है फिर उसे घर से खबर मिलती है की उसके पिताजी को लकवा हो गया है वह उल्टे पैर वापस घर लौटता है और प्रण करता है की लाचार पिताजी की सेवा करते हुवे रतलाम में ही कुछ करके दिखाऊंगा। फिर शुरू होता है संघर्ष का अनवरत दौर घर मे कमाने वाला अकेला सदस्य ऊपर से बीमार पिताजी और माताजी की सेवा में समय देना और सब जिम्मेदारी निभाने के बाद कुछ कर दिखाने का जुनून सबसे पहले जोड़ जुगाड़ कर एक रिकार्डिंग स्टूडियो की स्थापना की और सॉफ्टवेयर इंजीनियर के साथ साउंड इंजीनियरिंग की अपनी योग्यता मेहनत और लगन से कई फिल्मों का म्यूजिक तैयार किया जिसमें एक था अन्ना प्रमुख थी। फिर किस्मत ने जोर मारा और लोकसेवा गारंटी का टेंडर उसके नाम खुल जाता है और घर ख़र्च की चिंता से मुक्ति मिल जाती है इस नये काम मे भी वह सफलता के झंडे गाड़ देता है और रतलाम सेंटर को इंदौर भोपाल जैसे सेंटरो से कार्यनिष्पादन में आगे निकाल कर रतलाम का नाम रौशन करता है। पर उसकी असली प्यास अभी बाकी थी क्योंकि उसने दुष्यंत का शेर पढ़ लिया था कि कौंन कहता है की आसमान में सुराख नही होता एक पत्थर तो दिल से उछालो यारो। तो लग जाता है वह अपने सपनो को पूरा करने के लिये और फ़िल्म बनाने के लिये खुद ही पटकथा लिखता है कलाकारों को ढूंढ के अपनी फिल्म के लिये निशुल्क काम करने के लिये तैयार करता है क्योंकि इतने पैसे नही है की कलाकारों को दे सके शूटिंग के लिये कैमरा खरीद के लाता है और फ़िल्म की शूटिंग शुरू होती है कई लोग हंसी उड़ाते हैं कई लोग हौसला बढ़ाते हैं लेकिन सबकी बातो से बेख़बर अपने लक्ष्य पर लगा हुआ यह नोजवान आखिरकार वह कर दिखाता है जिसकी रतलाम जैसे शहर में कल्पना भी नही की जा सकती और वह सीमित संसाधनों के बल पर बगैर व्यवसायिक कलाकारों के बॉलीवुड की टक्कर की फ़िल्म मालवा मराठा बना डालता है जितना बजट बॉलीवुड की फिल्मों में चाय पानी का होता होगा हैउसके तिहाई लागत में यह बन्दा उनके टक्कर की फ़िल्म बना देता है यह आश्चर्य नही तो क्या है इसके बाद सेंसर बोर्ड इस फ़िल्म में ढेर सारे कट लगा कर इस फ़िल्म को रोकने का प्रयास करता है लेकिन उनसे भी जद्दोजहद कर वह सिर्फ पांच कट लगवा कर फ़िल्म को पास करा लाता है। इस के पास प्रचार प्रसार का बजट नही है टाकीज में लगाने के पैसे नहीं है फिर भी मन्दसौर जैसे शहर में संजू जैसी फ़िल्म के सामने इस फ़िल्म ने अच्छा कलेक्शन किया लेकिन रतलाम जैसे शहर में जो बाहर के कलाकारों को सिर आंखों पर बिठाता है अपने ही शहर के लोगो को लेकर बनाई इस पिक्चर को जो शुरू से अंत तक आपको बांधे रखती है लोगों द्वारा जो छप्पर फ़ाड़ उत्साह दिखाना चाहिए वह नही मिलना यह साबित करता है की हम अपनी मिट्टी को अपने कलाकारों को उतना सम्मान नही देते जिसके की वह हकदार हैं विवादस्पद हिन्दू नेता जगदीश पाटीदार की असल कहानी पर फिल्माई गई इस पिक्चर को वो लोग भी देखने नही गये जिनकी राजनीति और रोजीरोटी इन्ही सब बातों को लेकर चलती है यह सब देखकर एक मेहनतकश फिल्मकार की तरफ से में इतना ही कह सकता हूं कि वाह रे रतलाम अच्छा सिला दिया तूने मेरी मेहनत का। अभी भी वक़्त है की आप इस फ़िल्म को गायत्री multiflex में देख कर इसके निर्माता हरीश शर्मा और बाकी कलाकारों का हौसला बड़ा सकते हैं।हो सकता है आपकी इस होंसला अफजाई का जादू किसी दिन रतलाम की झोली में आस्कर अवार्ड डाल दे और रतलाम का नाम हॉलीवुड और बॉलीवुड के बाद लॉलीवुड के रूप में जग प्रसिद्ध हो जाये क्योंकि महान वैज्ञानिक और राष्ट्रपति कलाम साहब कहते थे की छोटे सपना देखना अपराध है और में कहता हूँ सपने देखने वाले का सहयोग नही करना ज्यादा बड़ा अपराध है। मेने अपने तई सहयोग कर दिया है अब आपकी बारी है।
