प्रशासन की नाकामी उजागर-:
प्रदेश में रबी सीजन के दौरान किसानों को खाद उपलब्ध कराने के सरकारी दावे ज़मीनी हकीकत में खोखले साबित हो रहे हैं। तहसील स्तर पर टोकन वितरण के बावजूद किसानों की भीड़ कम नहीं हो रही, बल्कि हालात और बदतर होते जा रहे हैं।
ताज़ा मामला रतलाम-जावरा क्षेत्र का है, जहां 350 किसानों को टोकन बांटने के बाद भी भीड़ नियंत्रित नहीं हो सकी। हालात इतने गंभीर हैं कि किसान खाद के इंतजार में ठंड में पूरी-पूरी रात वेयरहाउस के बाहर बिताने को मजबूर हैं।
टोकन व्यवस्था बनी मज़ाक-:
प्रशासन द्वारा अव्यवस्था रोकने के लिए टोकन सिस्टम लागू किया गया, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसका कोई असर नहीं दिख रहा। सीमित मात्रा में टोकन दिए जा रहे हैं, जबकि मांग कई गुना अधिक है। किसानों का कहना है कि टोकन मिलने के बाद भी खाद मिलने की कोई गारंटी नहीं।
महिला किसान भी कतारों में-:
खाद के लिए लगी लंबी कतारों में बड़ी संख्या में महिला किसान भी शामिल हैं। प्रशासनिक लापरवाही के कारण बुजुर्ग, महिलाएं और छोटे किसान घंटों लाइन में खड़े रहने को मजबूर हैं। यह स्थिति सरकार की किसान-हितैषी नीतियों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।
एक कर्मचारी, सैकड़ों किसान-:
कई वितरण केंद्रों पर एक ही कर्मचारी के भरोसे सैकड़ों किसानों को खाद देने की जिम्मेदारी डाल दी गई है। न बैठने की व्यवस्था, न पीने के पानी की, न शौचालय की—सरकारी इंतज़ाम पूरी तरह फेल नजर आ रहे हैं।
ठंड में रात गुजार रहे किसान-:
कई किसान रात से ही वेयरहाउस के बाहर डेरा डालकर बैठे हैं। कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे सोना मजबूरी बन चुका है। यह तस्वीरें बताती हैं कि सरकार और प्रशासन की व्यवस्थाएं सिर्फ फाइलों तक सीमित हैं।
विपक्ष के सवाल, सरकार मौन-:
इस पूरे मामले पर विपक्ष ने सरकार को घेरते हुए इसे “किसान विरोधी रवैया” बताया है। वहीं प्रशासन की ओर से सिर्फ आश्वासन दिए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात जस के तस बने हुए हैं।
सवाल वही है…
जब खाद की मांग पहले से पता थी, तो पर्याप्त व्यवस्था क्यों नहीं की गई?क्यों किसान आज भी सम्मान नहीं, बल्कि अपमान झेलने को मजबूर हैं?
