रतलाम। लगता है भाजपा संगठन ने पूर्व के किसान आंदोलन से कोई सबक नहीं लिया है। यही कारण है कि एक महीना पूर्व से घोषित किसान आंदोलन के लिए भाजपा संगठन ने न तो किसानों से संपर्क किया न किसान चौपाल आयोजित कर उनको विश्वास में लेने का साहस दिखाया रतलाम ग्रामीण के भाजपा विधायक मथुरालाल डामर कहते हैं कि जितना किसानों के लिए भाजपा सरकार ने किया आज तक किसी ने नहीं किया। कांग्रेस की मानसिकता के किसान ही इस आंदोलन के पीछे है और गुण चोर है किसान आंदोलन पूरी तरह फेल होगा हमने सब किसानों को कह दिया कि कोई भी इस आंदोलन में नहीं जाए। यही कारण है कि पुलिस और प्रशासन को अपने तरीकों से किसान आंदोलन को काबू में रखने के लिए मशक्कत करना पड़ रही है। लगता है कि चुनाव को नजदीक देखकर सरकार और संगठन दोनों इस आंदोलन से घबराए हुए हैं। यही कारण है कि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है वाली कहावत नजर आ रही है जितना प्रचार प्रसार किसानो ने अपने इस आंदोलन का नहीं किया है उससे ज्यादा प्रचार प्रसार पुलिस व प्रशासन ने अखबारों में 2000 नोटिस दिए। 1500 किसानों को बांड ओवर किया। जैसी खबरे छपवाकर कर दिया किसान आंदोलन के संदर्भ में जमुनिया के सरपंच राम सिंह कहते हैं पिछले 3 सालों में किसानों की हालत बहुत ज्यादा खराब हुई है। भावांतर योजना पूरी तरह फेल है और इससे सिर्फ व्यापारियों का फायदा हो रहा है किसानों का नहीं इसी तरह तीतरी के प्रकाश पाटीदार कहते हैं पिछले 3 सालों में किसानों की माली हालत खराब होना शुरू हुई है यही कारण है कि मध्यप्रदेश में निरंतर किसान आत्म हत्याओं की खबरें आप अखबारों में पढ़ते हैं। इसी प्रकार नलकुई के किसान पारस पाटीदार और कुआं झागर के किसान राम चौधरी भी कहते हैं कि केंद्र और राज्य की गलत नीतियों के कारण किसानों की हालत बिगड़ती जा रही है। तितरी के किसान राजेश पुरोहित जो कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए हैं का कहना है कि किसानों की आमदनी दोगुनी करने की बातें हो रही है। वास्तव में किसान पहले जितना कमाता था उसकी आमदनी उससे आधी रह गई है। यही हाल रहा तो देश खेती और किसानी खत्म हो जाएगी। सरकार को अपने वादे पूरे करना चाहिए ज्यादातर किसानों का यह कहना है कि पुलिस जिस प्रकार शक्ति के साथ आंदोलन को दबाना चाहती है। निर्दोष और बेगुनाह किसानों को बांड ओवर करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इससे ऐसा लगता है कि सरकार और प्रशासन किसानों का दुख दर्द समझने की कोशिश नहीं कर रहे हैं और इस आंदोलन को राजनीतिक तराजू पर तोल रहे हैं इस कारण किसान चाहे वह किसी भी पार्टी की विचारधारा का हो खामोश है। पुलिस की एहतियात स्वरूप की जाने वाली कार्यवाही इतने बड़े पैमाने पर हुई है की किसान इसे दबाव और दमन मानने लगे है। यही कारण है कि ऊपर से एकदम शांत दिखाई देने वाले किसान आंदोलन की स्थिति प्रेशर कुकर की तरह हो गई है और किसान एक सीमा तक इस दबाव को सहन करेगा यदि उस सीमा से आगे दबाव बढ़ता है तो जिस तरह प्रेशर कुकर से भाप रिलीज नहीं होने के कारण ढक्कन फट जाता है ऐसी ही परिणीति इस किसान आंदोलन की हो सकती है। इसलिए पुलिस और प्रशासन को फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा 1 महीने पहले घोषित इस आंदोलन को सरकार यदि गम्भीरता से लेती तो संगठन के माध्यम से काफी कुछ किसानों को विश्वास में लिया जा सकता था लेकिन सरकार ने पुलिस और प्रशासन के दम पर निपटने की सोची है देखते हैं। सरकार की रणनीति कितनी सफल होती है वैसे आम जनता को अपनी जरूरतों की चीज़ो का दो-तीन दिन का स्टॉक रख लेना चाहिए और प्रार्थना करना चाहिए कि किसान आंदोलन ज्यादा लंबा नहीं चले और शांतिपूर्ण तरीके से निपट जाए।
