खबर पक्की: 28 मई रतलाम रतलाम, आईस फेक्ट्री की शासकीय रिकॉर्ड में हुए घोटालो से लीज की जमीन को निजी बताकर कॉलोनी काटने की संपूर्ण कार्यवाही के विरूद्ध गत दिनों इंदौर हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है।
यह याचिका शहर की जानी मानी सामाजिक कार्यकर्ता एवं पूर्व कांग्रेस नेत्री श्रीमती अदिती
दवेसर द्वारा लगाई गई है।
दायर याचिका में श्रीमती अदिती दवेसर ने वर्तमान लीजधारी श्री जोगेन्द्रनाथपुरी द्वारा समय-समय पर शासकीय कागजो मे झूठी जानकारिया देते हुए और अफसरो से साठगाठ कर लीज की जमीन को धीरे-धीरे अपने स्वामित्व की अभिलेखो मे दर्ज करा ली। यह एक लम्बी कहानी है, जिसमे धोखाधड़ी का सुनियोजित षड्यंत्र रचते हुए लगभग 100 करोड़ की इस भूमि को अपने नाम पर चढ़ा कर ताबड़तोड़ विक्रय कर दिया। और तत्कालीन कलेक्टर कुमार पुरषोत्तम द्वारा भारी भ्रष्टाचार के चलते आनन-फानन में इसका पंजीयन व नामांतरण और सारी कार्रवाई पूर्ण करवाई
श्रीमती अदिती दवेसर द्वारा न्यायालय को यह बताया गया है कि वह भूमि लीज पट्टे पर श्री प्रेमनाथपुरी जो की जोगेन्द्रनाथपुरी के पिताजी थे उनको सीधे-सीधे 1946 में 99 वर्ष की लीज पर तत्कालिन महाराजा श्री सज्जन सिंह जी द्वारा आईस फैक्ट्री स्थापना के विशेष प्रयोजन हेतु आवंटन कर उद्योग चलाने की अनुमति दी गई थी।
कहानी में मोड़ किस प्रकार आया यह शासकीय अधिकारी भी कभी नही जान पाए शासकीय रिकार्ड में श्री प्रेमनाथपुरी के नाम के आगे उनके पिता आर.बी. (राय बहादुर) रामरतन का नाम दर्ज हुआ। पूर्व के समय सभी लोग अपने नाम के आगे अपने पिताजी का नाम लगाया करते थे। शायद उसी परिपाटी का पालन करते हुए शासकीय अभिलेखो मे आर.बी. (राय बहादुर) रामरतन का नाम दर्ज किया गया होगा। श्री आर.बी. (राय बहादुर) राम रतन की मृत्यु वर्ष 1955 मे हो चुकी थी। जबकि आईस फेक्ट्री की लीज होल्ड जमीन श्री प्रेमनाथपुरी के नाम पर आवंटित की गई थी। इस प्रकार आर. बी. रामरतन का इस संपत्ति पर किसी भी प्रकार का कोई अधिकार नही था।
परन्तु इस नाम के आधार का फायदा उठाते हुए षड़यंत्रकारी जोगेन्द्रनाथपुरी ने वर्ष 1970 मे अपने पिताजी प्रेमनाथपुरी के जीवित रहते हुए सुनियोजित तरीके से शासकीय अभिलेखो मे हेराफेरी करने के उद्देश्य से अधिकारियो को भ्रमित करके ओर अंधेरे मे रखते हुए आर.बी. रामरतन की वर्ष 1955 मे मृत्यु होना बताकर स्वयं के नाम जोगेन्द्रनाथुपुरी का नाम दर्ज करने का आवेदन प्रस्तुत किये बिना राजस्व अधिकारियो को आगे कर वर्ष 1970 में कार्यवाही प्रारंभ कर धीरे से वर्ष 1972 मे प्रेमनाथपुरी के स्थान पर, जो कि स्वयं जीवित थे ओर मुल लीज धारित है, उनके जीवित रहते हुए इस भूमि का लीजधारी के नाम पर जोगेन्द्रनाथपुरी का नाम बतौर शासकीय पट्टा ग्रहिता दर्ज कर दिया।
वर्ष 1975 मे जब नई पावतीया बनना शुरू हुई तब 50978 क्रमांक की एक भू-अधिकार ऋण पुस्तिका जोगेन्द्रनाथपुरी को बतौर लीजधारी जारी हुई किन्तु कुटरचित दस्तावेज कर उन्होंने लीजधारी के चिन्ह को मिटाकर अपने हाथ से भूमि स्वामी चिन्ह पर (1) का निशान लगाकर एक कुटरचित दस्तावेज तैयार किया जिसके आधार पर बाद मे उन्होने पुरे प्रशासन को बर्गलाकर भूमि अपने नाम करने का एक गहरी साजिश की, जिसमे सफल भी हुए है।
श्रीमती दवेसर ने अपनी याचिका मे बताया कि वर्ष 1946 मे प्रेमनाथपुरी के नाम पर संपादित लीज पत्र प्रेमनाथपुरी के जीवनकाल में बिना शासकीय अनुमति के इस लीज को किसी अन्य के नाम पर नामांतरण करने का किसी को भी अधिकार नही था किन्तु आर.बी. रामरतन की मृत्यु की मात्र जानकारी प्राप्त होने तथा फर्जी पारिवारिक लेख का आधार बताकर जोगेन्द्रनाथपुरी ने उनके पिता श्री प्रेमनाथपुरी के जीवित रहते उनका नाम हटाते हुए स्वयं का नाम बतौर लीजधारी बड़ी चालाकीपूर्वक दर्ज करव लिया। प्रेमनाथपुरी की वास्तविक मृत्यु वर्ष 1980 में हुई है ओर इससे पूर्व उनके पुत्र जोगेन्द्रनाथपुरी का नाम वर्ष 1975 में दर्ज होने का कोई प्रश्न ही नही था।
अतः वर्ष 1980 के पूर्व जोगेन्द्रनाथपुरी का शासकीय रिकार्ड में नाम दर्ज किया जाना पूर्ण रूप से अवैध, नियम विरूद्ध तथा शासकीय कार्यों में हेराफेरी का व झूठी जानकारी देकर फर्जी दस्तावेजो के द्वारा नाम दर्ज करवाने का मामला बनता है और इस प्रकार इस अवधि में वर्ष 1975 में उनके नाम से जारी की 1 गई भू-अधिकार पुस्तिका पूर्ण रूप से लीजधारी की अवधि के अंदर भूमि स्वामी की जारी होना पुर्णतया असंभव व अवैध है।
अतः यदि इस भू-अधिकार ऋण पुस्तिका के आधार पर किया गया कोई भी हस्तांतरण अवैध व शून्य घोषित होगा। यह एक गंभीर जांच का विषय है। इस बात को तथ्य व प्रमाण सहित श्रीमती अदिती दवेसर ने उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की है।
जोगेन्द्रनाथपुरी द्वारा यहां से शुरू करत हुए अपने नाम पर लीज डीड की जमीन को निजी भूमि स्वामी की जमीन बताने का लम्बा षड़यंत्र कर समय-समय पर विभिन्न न्यायालयो एवं शासकीय विभागो को भ्रमित करते हुए, झूठी जानकारी देते हुए, दस्तावेजों में हेराफेरी करते हुए ओर शासकीय लोगो पर अपने रोब, संपर्को व शासकीय प्रक्रिया की कमजोरियो का लाभ लेकर, अधिकारियों से साठगाठ कर विधि विरूद्ध तरीके से 100 करोड़ की बेशकीमती भूमि को अपने नाम पर दर्ज करवाकर विक्रय कर दिया है। जिसकी ना केवल जांच की जाकर इस भूमि को पुनः शासकीय संपत्ति घोषित किया जावे अपितु षड़यंत्रकारी जोगेन्द्रनाथपुरी व अपराध में शामिल अन्य लोगो को जेल मे बंद कर कड़ी से कड़ी सजा दी जाए। ताकि भविष्य में इस प्रकार के षड़यंत्र की पुनरावृति ना होवे ।

