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2300 साल पुराने ग्यारवें रूद्र विरूपाक्ष महादेव ……! श्रावण मास के द्वितीय सोमवार पर आज 20 हजार श्रद्धालुओं का सैलाब

BySurendra Jain

Jul 25, 2022


खबर पक्की: 25 जुलाई रतलाम, समय के साथ परंपराओं में बदलाव आ रहा है पहले यदा-कदा सावन में लोग दर्शन करने आते थे किंतु अब गांव के गांव संपूर्ण मातृ शक्ति, बच्चे क्या बूढ़े, सभी युवा ढोल नगाड़ों के साथ, नंगे पैर, जय भोले की भक्ति के गीत गाते हुए कावड़ लेकर भगवान विरुपाक्ष का जलाभिषेक करते हैं। श्रद्धालुओं की संख्या वर्ष प्रतिवर्ष धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है । संपूर्ण गांव के युवा, मातृशक्ति सभी निशुल्क चाय कैंटीन, फरियाली स्टॉल की व्यवस्था करते हैं । सावन महीने के सभी सोमवार जिससे जो बन पड़ता है वह गांव आने वाले श्रद्धालुओं के आतिथ्य में कोई कमी नहीं छोड़ता है।
अतीत कालखंड में इस मंदिर की भव्यता और दिव्यता क्या रही होगी इसका जानकारी हमे विरूपाक्षेश्वर प्रशस्ति से ज्ञात होती है । आकाश में चलने वाली सुंदरिया क्रीड़ा करती हुई कभी-कभी यहां आया जाया करती थी (पध 24), स्वर्णमय कलश एवं ध्वज युक्त स्वच्छ कीर्ति से उसकी आकृति कपिश वर्णन की भांति दिखाई पड़ रही थी, मानो गैरिक (कैलाश) भगवान शिव और पार्वती का गैरिक गौरव मंदिर को प्राप्त हो गया है । (पध25)

महान पुरातत्व वेता डॉ. विष्णुधर श्री वाकणकर एवं स्व.ओम प्रकाश जी पंड्या के शोध ग्रंथो से प्राप्त जानकारी अनुसार यह स्थल प्राचीन समय में मालवा का एक समृद्ध शाली नगर था परंतु १२ वीं शताब्दी के मध्य में किसी कारण से यह अवनति की ओर अग्रसर होकर खंडहर में परिवर्तित हो गया ।

यह स्थल विशेषकर वस्तुतः मौर्य काल के पूर्व से ही शिव उपासना का अति विशिष्ट केंद्र रहा है, मौर्य काल में निर्मित शिव मंदिर के मौर्यकालीन स्तंभ का एक शीर्ष वर्तमान शिव मंदिर के सभागृह में 850 वर्ष पूर्व जीर्णोद्धार के समय से आज तक एक गवाक्ष में लगा है । प्राचीन काल के इस स्थान विशेष की परंपरागत धार्मिकता का यह एक प्रत्यक्ष प्रमाण है।

१२वीं शताब्दी के अंत में गुजरात के महाराज जयसिंह सिद्धराज चालुक्य नरेश जिसने मालवा राज्य को जीता वह खंडहर वाले गांव से गुजर रहा था उसने देखा कि प्राचीन शिव मंदिर ग्राम के मध्य क्षतिग्रस्त व ध्वस्त रूप में है। उन्होंने तत्काल मंदिर के जीर्णोद्धार का आदेश दिया तथा मूल प्रतिमा को पुनः विरुपाक्ष के नाम से प्रतिष्ठित किया। पूर्व में इस स्थल का क्या नाम था यह किसी को ज्ञात नहीं ।

इस प्रकार कालांतर में नए स्थल का नाम परिवर्तित होकर बिलपांक बन गया विरुपक्षी> बिलुपाक्ष>बिलुपांख >बिलपांक
अतः अतः बिलपांक विरूपाक्ष का ही अपभ्रंश है।

विरुपाक्ष महादेव मंदिर का मूल शिखर,शिव पंचायतन की अति प्राचीन मू मुस्लिम आक्रमण के समय नष्ट कर दिया गया था बाद के कालखंड में सैलाना के राजाओं द्वारा भी इसका जीर्णोद्धार कराया गया ।

इस मंदिर के चारों ओर सुरक्षा दीवार थी जो अब नष्ट हो चुकी है इस दीवार के अवशेष अभी मंदिर के पश्चिम की ओर दिखाई देते हैं मंदिर के उत्तर पश्चिम में थोड़ी दूरी पर एक जलकुंड भी है ।

मंदिर के इतिहास और सुन्दर वास्तुकला के कारण इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल में शामिल होने के प्रयास किए जा सकते है ।

विरुपाक्ष महादेव से संबंधित ऐतिहासिक तथ्यों व किंवदंतियों के संग्रह का श्रेय स्व.ओम प्रकाश पंड्या जी को जाता है।

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