रतलाम: खबर पक्की 16 फरवरी, बहुत संभव है कि इस महीने के अंत में या मार्च के फर्स्ट वीक में निकाय चुनाव की घोषणा हो जाए। दोनों पार्टियां कांग्रेस और भाजपा अपने अपने स्तर पर इसकी तैयारी में लगी हुई है पिछले 25, 26 साल से कांग्रेस जहां निकाय चुनाव में एक अदद जीत की तलाश में है पिछले सभी चुनाव में हार के बनिस्बत इस बार कांग्रेस संगठन थोड़ा उम्मीद से है और टिकट वितरण अगर बेहतर होता है तो अच्छा प्रदर्शन कर पाएगा महापौर चुनना तो कांग्रेस के लिए अभी भी दूर की कौड़ी है किंतु अगर पार्षदों में अच्छी सीटे ले आती है वही उसके लिए संतोष की बात होगी। समस्या सत्तारूढ़ पार्टी में भी कम नहीं है निकाय से लेकर दिल्ली तक हर जगह अपनी ही पार्टी की सत्ता होने से जनता की समस्याओं का समाधान और सवाल सब उससे ही होना है। एक तरफ पूर्व महापौर सुनीता यार्दे और हिम्मत कोठारी का गुट है तो दूसरी तरफ रतलाम में विकास पुरुष की छवि अख्तियार कर चुके विधायक चैतन्य कश्यप का गुट है, इन सबके बीच भाजपा r.s.s. संगठन में बरसों से काम कर रहे कार्यकर्ता और स्वयंसेवक है। दोनों गुट के कार्यकर्ताओं और संगठन के लेवल पर कार्य कर रहे कार्यकर्ताओं में निकाय चुनाव को लेकर भारी अपेक्षाएं बढ़ गई है। दोनों ही गुट के नेता और संगठन के पदाधिकारी अपने कार्यकर्ताओं की अपेक्षा और आशाओं पर खरे नही उतरते और अपने लोगों को टिकट दिला पाने में यदि विफल रहते हैं तो बहुत संभव है कि यह टिकट पाने में विफल सारे लोग एक नए मोर्चे के तहत अपनी ही पार्टी के उम्मीदवारों को चुनौती देते दिखे। क्योंकि हर कार्यकर्ता को यह लगता है के बरसो अपना समय श्रम और पैसा देने के बाद यदि उसे उसका उचित प्रतिफल नहीं मिलता तो ऐसे नेता से जुड़े रहने का क्या फायदा। प्राय: भाजपा संगठन में यह देखा जाता है कि स्थापित नेताओं के पर कतरने के चक्कर में वह ऐसे अ गंभीर राजनीतिक लोगों को टिकट दे देता है जो समाधान कम कर पाते हैं और खुद समस्या बन जाते हैं अब जबकि जनता की आशाएं और अपेक्षाएं कुलांचे भर रही है अगर सत्ता और संगठन समन्वय के साथ सही लोगों को टिकट नहीं देते तो निकाय चुनाव में भी विधानसभा चुनाव का इतिहास दोहराया जा सकता है दोनों ही दल के नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर है देखना है ऊंट किस करवट बैठता है।
