खबर पक्की: 18 जुलाई जबलपुर, मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधिपतियो की शीघ्र एवं त्वरित न्याय की संकल्पना का जीता जागता उदाहरण देखिये।
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अधिनस्थ न्यायालय के न्यायाधीशों पर दवाब बनाते है कि 5 वर्ष व उससे अधिक के प्रकरणों का निराकरण शीघ्रता से किया जावे, (और जनहित में दवाब होना भी चाहिए) यदि नही किया जाता है तो उनके विरुद्ध कार्यवाही करने व वार्षिक गोपनीय चरित्रावली खराब करने की धमकी दी जाती है, किन्तु जब बात स्वयं अपनी न्यायाधिपतियो की कार्य प्रणाली की आवे तो पल्ला झाड़ लिया जाता है, , और सुनवाई करना तो दूर प्रकरण की सुनवाई हेतु लिस्टिंग तक नही की जाती है।
ज्वलंत उदाहरण देखिये मात्र इस प्रदेश के उच्च न्यायालय में जानबूझकर या लापरवाही के कारण जजों के द्वारा प्रस्तुत याचिकाओं का निराकरण किस कारण से नही किया जा रहा है, इतने-इतने महान विद्वान न्यायाधिपति इस प्रदेश में हुए। आखिर क्यों जजों द्वारा प्रस्तुत याचिकाओं का निराकरण नही किया जा रहा है, कुछ न कुछ तो इन याचिका में राज जरूर है।
09/07/2007 को प्रस्तुत याचिका(सलग्न लंबित होने बाबत दस्तावेज) जो विगत 12 वर्ष से अधिक समय से लंबित है, उसके निराकरण की पहल अवश्य की जानी चाहिये किन्तु जब तक याचिका प्रस्तुत करने वाला जज सेवानिवृत्त नही हो जावेगा, तब तक उसका निराकरण नही होता है। जबकि उक्त याचिका में दिनांक 26/09/2017 (सलग्न आदेश की प्रति) को मध्यप्रदेश के मुख्य न्यायाधिपति श्री हेमंत गुप्ता द्वारा शीघ्रता से निराकरण के आदेश दिए गए थे किन्तु दुर्भाग्य देखिये लगभग 2 वर्ष पूर्ण होने को है, शीघ्रता कही दिखाई नही दे रही है, इन 2 वर्षों में एक बार भी सुनवाई आखिर क्यों नही की जा रही है।
इस तरह क्या 12 वर्ष से लंबित याचिका का निराकरण नैतिकता के नाते नही किया जाना चाहिए, किन्तु उसका निराकरण जज के सेवानिवृत्त होने तक नही होता है यह हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिह्न नहीं तो और क्या है।
न्यायाधीशों को ही नहीं मिलता है न्याय, कई याचिकाएं लंबित है उच्च न्यायालय में
