खबर पक्की: वैसे तो निगम आयुक्त एसके सिंह अपने संबंधों के कारण किसी की परवाह नहीं करते लेकिन उनकी हिम्मत की दाद देना पड़ेगी कि 2007 से लंबित नामांतरण भी वे चुनाव आचार संहिता के दौरान कर रहे थे। अर्थात उन्हें निर्वाचन अधिकारी और निर्वाचन आयुक्त की भी परवाह नहीं थी। 474 नामांतरण करने के लिए 19 अक्टूबर को जारी विज्ञप्ति की खबर हमारे द्वारा लगाने के पश्चात जिला निर्वाचन अधिकारी ने उन्हें आदर्श आचरण संहिता उल्लंघन का नोटिस जारी किया था उसके जवाब में उन्होंने बताया कि 2007 से लंबित नामांतरण भी इस सूची में शामिल है अमूमन दस बीस नामांतरण हर महीने होते हैं। किंतु निजी स्वार्थों के चलते वर्षों से लंबित प्रकरणों को भी आदर्श आचार संहिता लगी होने के बावजूद करना यह दर्शाता है कि सत्तारूढ़ दल का पूरा समर्थन इन्हें प्राप्त है और इन्हें किसी की परवाह नहीं है। जवाब में उन्होंने यह भी कहा है कि नामांतरण एक सामान्य प्रक्रिया है और अन्य जिलों में भी होता है किंतु उन्होंने यह नहीं बताया कि इतने पुराने और इतने लंबित प्रकरणों को एक साथ निपटाना और वह भी आचार संहिता के दौरान ऐसा क्या आसमानी सुल्तानी हो गया था कि जो 11 साल से लंबित प्रकरण थे उनको भी अभी ही निपटाना जरूरी था साफ इशारा है कि अपने आर्थिक हितों के साथ साथ सत्तारूढ़ दल के नेताओं को भी इनको लाभान्वित करना था। बहर हाल जिला कलेक्टर द्वारा इनके जवाब को अपनी टीप के साथ निर्वाचन आयोग को भेजा जा रहा है। निर्वाचन आयोग को ही निर्णय लेना है कि इनका क्या किया जाए।
