दिल्ली : गुड गवर्नेंस और पारदर्शिता के लिए लागू सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) का देश में बुरा हाल है। जनता को न समय से जनहित से जुड़ीं सूचनाएं मिल रही हैं और न ही सूचना देने में आनाकानी करने वाले अफसरों पर जुर्माना ही लग पा रहा है। इस वजह से केंद्र से लेकर राज्य के सूचना आयोगों में शिकायतों की ‘बाढ़’ दिख रही है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया ने गुरुवार 11 अक्टूबर को जारी नवीनतम रिपोर्ट में आरटीआई को लेकर चौंकाने वाली रिपोर्ट पेश की है। पहली बार सामने आए आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2005-16 के बीच आयोगों को 18 लाख से ज्यादा शिकायतें पहुंचीं।ये शिकायतें सेकंड अपील के तौर पर पहुंचीं। यानी पहली अर्जी पर जब सरकारी मुलाजिमों ने सूचना नहीं दी तो आवेदकों को शिकायत के साथ दूसरी अपील करनी पड़ी। देश में 48 सूचना आयुक्त का पद खाली है जिस की नियुक्ति के लिए सरकारें ध्यान नहीं दे रही है भारत से 9 साल बाद इस कानून को लागू करने वाला अफगानिस्तान आज दुनिया में पहले नंबर पर है जबकि 11 साल बाद श्रीलंका ने इस कानून को अपने यहां लागू किया और वह आज तीसरे नंबर पर है मनमोहन सिंह की सरकार के समय भारत इस कानून के तहत दुनिया में दूसरे नंबर का देश था जो पारदर्शिता के साथ सूचना उपलब्ध करवा रहा था। ज्ञातव्य है कि मोदी सरकार ने इस कानून में फेरबदल की कोशिश की थी लेकिन संसद में सवाल उठने और देश में विरोध होने के कारण उसे संशोधन टालना पड़ा। देश जानता है इसी सूचना के अधिकार कानून से 2G और कोलगेट जैसे स्कैम जनता के सामने आये और कांग्रेस की सरकार को जाना पड़ा था।
