65 दिनों में दिल्ली पहुंचेगी संविधान बचाओ यात्रा
रतलाम। 2 अक्टूबर गुजरात के डाडी से प्रारंभ हुई “संविधान सम्मान” संविधान बचाओ यात्रा 26 राज्यों से होती हुई 65 दिनों में 10 दिसंबर को दिल्ली पहुंचेगी यात्रा का उद्देश्य सर्वधर्म समभाव और समाजवाद का आग्रह लेकर बुनियादी अधिकार जताने व जातिवाद के नाम पर फैलाई जा रही हिंसा का विरोध दर्ज कराने मानवता का संदेश लेकर यात्रा निकाली गई।
यात्रा की जानकारी देते हुए कृष्णकांत व नर्मदा बचाओ आंदोलन की प्रेरणा मेघा पाटकर ने बताया कि किसान मजदूरों मछुआरों कारीगरों छोटे बड़े व्यापारियों पर उनके जल जमीन जंगल और रोजगार पर तथा आजीविका चलाने पर जो हमला हो रहे हैं। उनके सामने हमारी संगठित ताकत और संघर्ष निर्माण के रास्ते तय करने सशक्त बनाने हैं। आज किसानों को उनकी उपज का वास्तविक मूल्य भी नहीं मिल पा रहा है उन्होंने कहा कि रतलाम-मंदसौर-नीमच क्षेत्र में नर्मदा-शिप्रा जोड़कर पानी लाने के लिए दावे किए जा रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि कागजों से बाहर पानी कभी निकलेगा ही नहीं। नर्मदा में पानी ही नहीं है, तो शिप्रा में कैसे लाया जा सकता है।
पाटकर के साथ करीब 50 से अधिक कार्यकर्ता भी रतलाम पहुंचे जो गुजरात के दांडी से दिल्ली तक निकाली जा रही संविधान बचाओ यात्रा में शामिल हैं। यात्रा में कार्यकर्ता 25 हजार किमी तक चलेंगे और रास्ते में पड़ने वाले प्रमुख स्थानों पर 300 से ज्यादा सभाएं भी करेंगे। इस दौरान मंदसौर से सभा के बाद कार्यकर्ता रतलाम पंहुचे। मेधा पाटकर ने यहां बताया कि सबसे बड़ी विडंबना यह है कि किसान आंदोलन में मंदसौर में जिन किसानों को गोली मारी गई थी उनके परिवार, साथियों पर जो केस हुए हैं वो आज भी वापस नहीं हुए हैं। गोली मारने का आदेश देने वालों पर आज भी कोई कार्रवाई करने को लेकर कोई बात तक सामने नहीं आई है। उन्होंने बताया कि जब गुजरात में चुनाव आने वाले थे तो नर्मदा, ताप्ती और सभी नदियों पर बने बांध भरे जा रहे थे, लोगों को दिखाया जा रहा था कि वहां के लिए ही सारा विकास किया जा रहा है। अब मध्यप्रदेश में चुनाव हैं तो यहां सभी बांध, नदियां कागजों पर भरी-पूरी दिखाकर विकास के गाने गाए जा रहे हैं। पानी न तो गुजरात वालों को मिला, न मध्यप्रदेश वालों को मिल रहा है।
इन उद्देश्य से निकल रही यात्रा….
मेधा पाटकर और साथियों ने बताया कि यात्रा का उद्देश्य यह है कि वर्तमान दौर में संवैधानिक मूल्यों का लगातार हनन हो रहा है। रास्ते में पड़ने वाले स्थानों पर किसानों, मछुवारों, दलितों, महिलाओं, घरेलू नौकरों, फैक्ट्री कर्मचारियों आदि पर हो रहे अत्याचारों पर चर्चा भी की जा रही है। साथ ही लोगों को भूमि अधिग्रहण कानून, विस्थापन कानून जैसे कानूनों से हो रहे उत्पीड़न को लेकर भी जागरुक किया जा रहा है। यात्रा का उद्देश्य यह है कि लोगों को जाति, धर्म, मजहब, वर्ग, रंग आदि के आधार पर बांटकर की जाने वाली राजनीति के बजाय सकारात्मक किया जाए। साथ ही किसानों की उपज के दाम तय करने सहित अन्य पुरानी लंबित मांग भी जारी हैं। पाटकर ने बताया कि यात्रा में मप्र, उप्र, उत्तराखंड, आसम, ओड़िसा, झारखंड, छत्तिसगढ, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, दिल्ली आदि में विभिन्न आंदोलनों से जुड़े कार्यकर्ता शामिल हैं। उनके साथ यात्रा में 50 से अधिक लोग दिल्ली, बिहार, महाराष्ट्र, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, असम, केरल, गुजरात आदि क्षेत्रों के साथ चल रहे हैं।
जल जंगल और जमीन पर हो रहे हमले को रोकना है- मेघा पाटकर
