खबर पक्की : 18 अप्रैल रतलाम के कई मीडिया संस्थानो ने भारत भर में नाम कमाने वाले डीपी ज्वेलर्स शोरूम के उद्घाटन से जुड़ी एक खबर चलाई है, जिसमें नगर निगम द्वारा उस पर अवैध होर्डिंग्स लगाने के आरोप में नोटिस जारी किया गया है वही संस्थान के डायरेक्टर अनिल कटारिया का कहना है की के हमने इंदौर की एडवरटाइजिंग एजेंसी को पूरा कॉन्ट्रैक्ट दिया है सारी जवाबदारी उनकी है हमारा कोई रोल नहीं है।ध्यान देने वाली बात यह है कि डीपी ज्वेलर्स और इन्हें नए नए चुनौती देने उतरे dpk ज्वेलर्स शहर के विभिन्न प्रमुख स्थलों पर नगर निगम से किराया देकर वैध रूप से होर्डिंग्स का उपयोग भी करते है। लेकिन इनके द्वारा किराया चुकाने के बावजूद इनके लगाये होर्डिंग पर नेता सांसद विधायक महापौर पहलवान और मंत्री के जन्मदिन के कटाउट बगैर किसी अनुमति के टांग दिए जाते हैं तब ना तो मीडिया संस्थान कोई आवाज उठाता है और ना हीं नगर निगम कोई कार्यवाही करता है।
सवाल यह नहीं है कि होर्डिंग्स वैध थे या नहीं, या अनुमति ली गई थी या नहीं। सवाल है नगर निगम व मीडिया के दृष्टिकोण और कार्यप्रणाली का। यदि कोई नियम उल्लंघन हुआ है तो निगम द्वारा नोटिस देना उचित है, और इसकी खबरें लगाने की अपेक्षा मीडिया से की जाती है परंतु क्या यही सख्ती नगर निगम उन राजनीतिक दलों, नेताओं, पहलवानोंऔर धार्मिक संस्थाओं पर भी दिखाता है, जो आए दिन बिजली के खंभों, सार्वजनिक दीवारों और अन्य नगर निगम की संपत्तियों पर बिना अनुमति बैनर, पोस्टर और होर्डिंग्स लगा देते हैं?
क्या कभी किसी राजनीतिक दल या नेता या पहलवान या किसी धार्मिक संस्था को आज तक नोटिस जारी किया गया? क्या नगर निगम ने समय-समय पर कभी ये जाँचा कि ऐसे पोस्टर और बैनर लगाने के लिए अनुमति ली गई थी या नहीं? यदि नहीं, तो फिर यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि नगर निगम की कार्यवाही चुनिंदा लोगों और संस्थाओं तक ही सीमित है – विशेषकर उन पर जो विधिवत शुल्क देकर निगम की सेवाएं लेते हैं। इसी तरह मीडिया को भी आत्म अवलोकन करना चाहिए की उनके किसी कृत्य से शहर को सैकड़ों की संख्या में रोजगार देने वाले और सरकार को करोड़ों का राजस्व देने वाले किसी प्रतिष्ठान संस्थान की इमेज से खिलवाड़ तो नहीं हो रहा
इसके अतिरिक्त, एक और चिंताजनक बात यह है कि ज्वेलर्स को नोटिस देना तो एक प्रशासनिक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन उसे सार्वजनिक रूप से मीडिया में इस प्रकार प्रसारित करना, क्या उचित है? इससे उस संस्था की प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है, जो पहले से ही नगर निगम को राजस्व प्रदान कर रही है।
तो क्या यह मान लिया जाए कि नगर निगम सिर्फ उन्हीं पर कार्यवाही करता है जो कानून का पालन करते हुए किराया अदा करते हैं, जबकि राजनीतिक और प्रभावशाली संस्थाओं को खुली छूट मिली हुई है?
अगर कानून सबके लिए बराबर है, तो कार्यवाही भी सब पर समान रूप से होनी चाहिए – बिना किसी भेदभाव के। यही बात मीडिया पर भी लागू होती है।

