खबर पक्की, 18 अप्रैल, रतलाम। तापमान 40 डिग्री के पार जा चुका है, शहर तप रहा है, और ऐसे समय में रतलाम सहित आसपास के क्षेत्रों में हरे-भरे पेड़ों की अंधाधुंध छंटनी की जा रही है। पत्तों से लदे वृक्षों की टहनियाँ इस तरह काटी जा रही हैं कि मानो हरियाली को ही ठिकाने लगाया जा रहा हो। यह कार्य ऐसे समय पर हो रहा है जब ये पेड़ इंसानों के साथ-साथ पशु-पक्षियों के लिए भी सबसे बड़ा सहारा होते हैं।
गर्मी में छाया और जीवन दोनों छिन रहे
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि गर्मी के मौसम में छंटनी करना न सिर्फ अनुचित है, बल्कि यह पर्यावरणीय असंतुलन को भी बढ़ावा देता है। पत्तियाँ जहां धूप से राहत देती हैं, वहीं वायुमंडल को ठंडा रखने में भी सहायक होती हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन पेड़ों पर बसे पक्षियों के घोंसले उजड़ रहे हैं। नन्हीं चिड़ियाँ और गिलहरियाँ बेघर होती दिख रही हैं, लेकिन जिम्मेदार प्रशासन अब तक मौन है।
“दाना-पानी की अपील, लेकिन घर उजाड़ने की छूट?”
वर्तमान में कई सामाजिक संगठन और प्रशासन पक्षियों को बचाने के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करने की अपील कर रहे हैं, लेकिन जब उन्हीं पक्षियों के घर उजड़ रहे हैं, तो यह पहल अधूरी और विरोधाभासी लगती है। यह संवेदनहीनता नहीं तो और क्या है?
बरसात या सर्दी नहीं है बेहतर समय?
विशेषज्ञों की राय है कि पेड़ों की छंटनी का उपयुक्त समय सर्दी या वर्षा ऋतु होती है, जब न तो पत्तियाँ होती हैं और न ही प्रजनन काल में पक्षी होते हैं।
कब जागेगा जिम्मेदार तंत्र?
हाल ही में रतलाम के सेंट जोसेफ कान्वेंट स्कूल में छंटनी के नाम पर पूरा पेड़ ही काट दिया गया था, जिस पर प्रशासन ने कार्रवाई भी की। लेकिन यही कार्रवाई बाकी जगहों पर क्यों नहीं हो रही? शहर के कई क्षेत्रों में लोग मनमर्जी से पेड़ों को काट रहे हैं, और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है। क्या यह प्रयास रतलाम को देश के सबसे गर्म शहरों में और ऊपर लाने के लिए हैं?
प्रश्न यह है: क्या यह सही समय है?
जब तापमान 40-45 डिग्री तक पहुंच रहा हो, तब पेड़ों की हरियाली को काटना न सिर्फ असंवेदनशीलता है, बल्कि मानवीय जिम्मेदारी से मुँह मोड़ना भी है। अब समय आ गया है कि हम न केवल पर्यावरण, बल्कि उसमें बसे जीवों के हक के प्रति भी जागरूक हों।
हरे-भरे पेड़ सिर्फ ज़मीन की शोभा नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं — हर उस प्राणी के लिए जो इस धरती को साझा करता है।

