खबर पक्की : 7 जुलाई रतलाम, 98 के बाद रतलाम में कांग्रेस का कोई महापौर या विधायक चुनाव नहीं जीता है उसके पूर्व जयंतीलाल जैन एक बार महापौर बने और दुर्घटना वर्ष शिवकुमार झालानी एक बार विधायक बने क्योंकि सरकार बनने के बाद चुनाव हुए थे। इसके पश्चात एक एक बार पारस सकलेचा निर्दलीय रूप से क्रमशः महापौर और विधायक बने। तत्पश्चात आशा मौर्य शैलेंद्र डागा और सुनीता यार्दे लगातार तीन बार भाजपा के महापौर बने। इसके बाद एक बार हिम्मत कोठारी और दो बार लगातार चैतन्य कश्यप भाजपा के विधायक चुने गए। अब भाजपा के प्रह्लाद पटेल के सामने चुनौती है कि वे 3 जीत के इस लगातार क्रम को कैसे बरकरार रखते हैं और जीत का चौका लगाते हैं। चुनाव को मात्र 5 दिन शेष है पर भाजपा के अधिकांश जमीनी कार्यकर्ता और वरिष्ठ नेता प्रचार के परिदृश्य से नदारद हैं और पूरा दारोमदार विधायक चैतन्य कश्यप के ऊपर है क्योंकि पार्टी ने उनके मन मुताबिक उम्मीदवार घोषित किया है तो जिताने की जिम्मेदारी भी अब उन्हीं के कंधों पर है। वैसे तो उन्होंने दावा किया है कि पिछले महापौर चुनाव से ज्यादा वोटों से लीड लेकर भाजपा उम्मीदवार को जिताएंगे पर जिन लोगों का टिकट उनके कारण कटा है वह क्यों कर उनकी इस मंशा को पूरा होने देंगे इसमें थोड़ा संशय है। क्योंकि अनुकूल परिणाम ही 2023 के विधानसभा चुनाव के टिकट की गारंटी भी है। पूरे प्रदेश में सबसे अंत में रतलाम के टिकट की कांग्रेस ने घोषणा की इसके बावजूद कांग्रेस के युवा प्रत्याशी मयंक जाट ने चुनाव को चुनौती में लेकर जिस प्रकार की चुनौती भाजपा को उसके ही गड़ में पेश की है वह काबिले तारीफ है। कांग्रेस से दगा कर कुछ पार्षदों ने कांग्रेस का टिकट प्राप्त कर जिस प्रकार की दगाबाजी की और मयंक जाट के चुनाव को पटरी से उतारने की कोशिश की उसके बावजूद जिस निर्भीकता और जांबाजी से मयंक ने अब तक के चुनाव को लिया है और उन्हें जिस प्रकार का समर्थन जनता से मिल रहा है उसको देखकर खुद कांग्रेसियों के साथ-साथ पूरी भाजपा हतप्रभ है। यही कारण है कि जिस महापौर चुनाव को भाजपा अपने लिए वॉक ओवर मानकर चल रही थी उसने मयंक की एक के बाद एक लगातार घोषणाओं से और जनता को नेता नहीं बेटा चुनने के नारे के साथ चुनाव को जिस तरह एकदम निकट का मुकाबला बना दिया उसको देख कर भाजपा को प्रदेश अध्यक्ष और स्वयं मुख्यमंत्री का रतलाम दौरा रखवाना पड़ा और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने विचारधारा और कामों का बखान करने के बजाय मयंक को टारगेट करते हुए जिस तरह निजी हमले किए उससे साफ हताशा झलकती है। बहरहाल अभी 5 दिन का वक्त बाकी है और मुकाबला दोनों के लिए ही खुला हुआ है जिसने आखरी वक्त पर अपने प्रबंधन को मजबूत कर लिया और जनता का दिल जीत लिया जीत उसी की होगी।

