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एक करोड़ की निधि का समर्पण और चुनाव ना जीता पाने की असमर्थता ने कलेक्टर को खो कर खरगोन भेजा। यूं अचानक कुमार का चले जाना इनसाइड स्टोरी समाप्त

BySurendra Jain

May 15, 2022

खबर पक्की :15 मई रतलाम, अभी तक आपने पढ़ा कोरोना को काबू में लाने से लेकर भू माफियाओं पर कार्रवाई और लंबित विकास योजनाओं को कलेक्टर द्वारा कागजों से निकालकर धरातल पर लाने की कहानी। लेकिन हर काम में जनप्रतिनिधि को नजरअंदाज कर बगैर उनको विश्वास में लिए कार्य करने की शैली ने जनप्रतिनिधियों के सम्मान और उनकी भावनाओं को आहत किया। अभी कुछ दिनों पहले वैष्णो देवी गई तीर्थ यात्रा के यात्रियों के कार्यक्रम में भी मध्य प्रदेश सरकार के संस्कृत बोर्ड के अध्यक्ष भरत बैरागी सहित विधायक चैतन्य काश्यप, भाजपा जिला अध्यक्ष राजेंद्र सिंह लूनेरा सहित अनेक भाजपा कार्यकर्ता उपस्थित थे लेकिन जिला प्रशासन द्वारा होने वाली पब्लिसिटी में प्रायः हर जगह सिर्फ कलेक्टर ही प्रमुखता से छाये रहते थे। जनभागीदारी से 100 तालाब बनाने की घोषणा भी कलेक्टर ने स्वंय बुलाकर मीडिया के सामने कर दी थी। जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति महज औपचारिकता बन कर और तालियां बजाने वालों जैसी हो गई थी। इससे जनप्रतिनिधि दिन पर दिन तनाव में आते जा रहे थे और प्रशासन से उनकी दूरी स्पष्ट परिलक्षित होने लगी थी। इस बारे में संगठन और पार्टी स्तर पर लगातार सरकार को सूचित करने के बावजूद कोई कार्यवाही नहीं हो पा रही थी। तभी अचानक सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया के बगैर आरक्षण के आपको जल्दी से जल्दी नगर निकाय और नगर पंचायतों के चुनाव कराना है। बस फिर क्या था अभी तक अपने आप को उपेक्षित महसूस कर रहे नगर विधायक चैतन्य काश्यप ने सुलेमानी दांव फेंकते हुए भाजपा संगठन को अपनी तरफ से 10000000 रुपए के समर्पण निधि भेंट करते हुए संगठन और सरकार को स्पष्ट संदेश भिजवा दिया की यह मेरी तरफ से आर्थिक मदद लेकिन नगर निकाय चुनाव जिताने में मैं इन कलेक्टर के रहते जीत दिलाने में
असमर्थ रहूंगा आप चुनाव जिताने की जिम्मेदारी इन्हें या चाहे जिसे सौंप दें। यह सुनते ही सरकार और संगठन के कान खड़े हो गए और कल फिर आनन-फानन में शाम को 8:00 बजे मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस ने तुरंत इनके तबादला आदेश को जारी किया। जो संगठन और सरकार महीनों से विधायक की बातों को तवज्जो नहीं दे रही थी चुनाव देखते ही आनन-फानन में उसे निर्णय लेना पड़ा। अगर सुप्रीम कोर्ट का जल्दी चुनाव कराने का फैसला नहीं आता तो हो सकता कलेक्टर की पारी आगे और लंबी चलती। कुल मिलाकर पूरे तबादले का लब्बोलुआब यह है कि जब तक कलेक्टर को मनमानी चलाना थी उन्होंने चला ली लेकिन चुनाव में जनप्रतिनिधि को ही जनता को फेस करना है अतः चुनाव आते ही जनप्रतिनिधि ने भी कलेक्टर को उनकी जगह बता दी। और समर्पण निधि के दाव ने सरकार और संगठन को समर्पण करने के लिए मजबूर करते हुए कलेक्टर के तबादला आदेश जारी करने के लिए विवश होना पड़ा। क्योंकि हर चुनाव जीतना जरूरी है। (इनसाइड स्टोरी 3 समाप्त)

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