खबर पक्की : 15 मई रतलाम, यूं अचानक से कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम का रतलाम से तबादला सिस्टम के काम करने के तरीके पर सवालिया निशान खड़े कर रहा है। कोरोना के चरम पर बढ़ती मौतो और बढ़ते खतरे के बीच रतलाम भेजे गए कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम ने अपनी युद्ध स्तरीय कार्यशैली के चलते जल्द ही इस पर काबू पा लिया। कलेक्टर गोपाल चंद्र ढांड के जाने और कुमार के आने पर मीडिया और राजनीतिक हलकों ने कयास लगाया कि गोपाल चंद्र ढांड की चैतन्य कश्यप से नजदीकी और जावरा विधायक राजेंद्र पांडे की नाराजगी तथा कोरोना का उफान उन पर भारी पड़ा। वही नवागत कलेक्टर के आने का श्रेय भी जावरा विधायक ने लूट लिया। लेकिन हकीकत में बढ़ते कोरोना के कारण, कोरोना से खुद पीड़ित होकर अच्छे हुवे कुमार पुरुषोत्तम को मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के वरद हस्त के कारण कोरोना से निपटने रतलाम भेजा गया था। लेकिन कोरोना से निपटने के बाद सरकारी जमीनों पर कब्जे और अवैध कॉलोनाइजेशन के खिलाफ मुहिम ने उनको बुलडोजर कलेक्टर की उपाधि दे दी थी। और प्रशासन का प्रताप स्थापित कर दिया था। किंतु इस ताबड़तोड़ मुहिम में गेंहू के साथ धुन की तरह कुछ बेगुनाह भी उलझ गए। चूंकि कलेक्टर रतलाम राजनीति से परे जिले की बिगड़ी व्यवस्था को ढर्रे पर लाने और बरसों से रुके विकास कार्यों को धरातल पर लाने की मुहिम में जुटे थे। लिहाजा मुख्य सचिव व मुख्यमंत्री ने उनके खिलाफ प्राप्त उनकी तमाम शिकायतों को नजरअंदाज कर दिया। और फ्री हेंड से काम करने के निर्देश जारी रखे। इस पर कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम दुगने जोश के साथ पुनः विकास कार्य में बगैर किसी परवाह के जुट गए। विरुपाक्ष महादेव मंदिर बिलपांक के साढ़े तीन करोड़ से जीर्णोद्धार की योजना हो, शहर के अंदर के फोर लेन हो, गोल्ड कांप्लेक्स की योजना हो, ट्रांसपोर्ट नगर की योजना हो नए जिला कोर्ट के लिए जमीन का आवंटन हो फूडपार्क की योजना हो या गरीबों को मकान उपलब्ध कराने की बात हो धड़ाधड़ सारी योजना कागजों से निकलकर धरातल पर आने लगी थी। लेकिन बुलेट की रफ्तार से योजनाओं का कागज से निकलकर धरातल पर आना और उसमें जनप्रतिनिधियों और उनके सुझावों को शामिल किए बगैर पूरा श्रेय प्रशासन द्वारा लूट ले जाना जनप्रतिनिधियों को रास नहीं आया और यहीं से कलेक्टर के ट्रांसफर की पटकथा शुरू हुई। बाकी की कहानी इनसाइड स्टोरी भाग 2 में।

