खबर पक्की :17 मार्च रतलाम, कल इस खबर को पढ़ने के बाद बहुत सारे पाठकों के सुझाव आए की आपने इसको पुरानी खबर से लिंक कर दिया तो लोग समझ नहीं पाए इसलिए फिर से इस खबर को दीजिए। पाठकों की बेहद मांग पर दोबारा से इस खबर को तफ़सील से प्रकाशित किया जा रहा है। घटना दिनांक 5 जुलाई की है अनुसूचित जनजाति के कुछ सदस्य की शिकायत पर कलेक्टर रतलाम द्वारा थावरा मंगला व नानूराम को एक 62 साल पुराने मामले में जो उनके बाप दादा द्वारा जमीन बेची गई थी उक्त सर्वे नंबर 175 की 16 बीघा जमीन जो वर्तमान में मुस्तफा मोहम्मद कागदी के नाम पर दर्ज थी जो उन्होंने 2019 में विधिवत सामान्य व्यक्ति से खरीदी थी का कब्जा बगैर उनको सुने मंगला थावरा और नानूराम व उनके अन्य भाई बंधुओं को दिलाने का आदेश एसडीएम को दिया था एसडीएम ने उक्त पर कार्रवाई के लिए तहसीलदार नवीन गर्ग को कहा और तहसीलदार ने मुस्तफा मोहम्मद और उनके अभिभाषक द्वारा इस संबंध में नकल मांगे जाने और सुनवाई का निवेदन किया किंतु उनके निवेदन पर ध्यान ना देते हुए तहसीलदार ने कलेक्टर के निर्देश पर उसी दिन कब्जा दिलाने का आदेश दे दिया और 6 तारीख को कब्जा भी दिला दिया। इसके बाद मुस्तफा मोहम्मद ने और उनके अभिभाषक ने अथक प्रयासों से उक्त मामले से संबंधित सारी फाइलों की नकल निकलवाई। और पाया कि उक्त मामले में किसी प्रकार की कोई धोखाधड़ी नहीं हुई है आदिवासी थावरा मंगला और नानूराम के परिजनों ने उक्त भूमि विक्रय की थी और रजिस्ट्री करवाई थी और तत्कालीन कलेक्टर विनय मलिक ने उनको परमिशन भी दी थी। इसके बाद 1980 में एक नया amendment अर्जुन सिंह के सरकार ने बनाया था जो 1959 की धारा 170 बी के अंतर्गत किसी भी सामान्य आदमी के पास यदि किसी आदिवासी की जमीन है तो उसको सूचना देना था कि वह जमीन उसके पास किस प्रकार आई है यदि सही तरीके से आई तो कोई दिक्कत नहीं लेकिन गलत तरीके से कपट पूर्वक ली गई है तो वह जमीन आदिवासी के नाम होना थी तो वह सूचना उक्त जमीन के मालिक द्वारा कलेक्ट्रेट में दी गई कलेक्टर द्वारा उक्त जानकारी को डिप्टी कलेक्टर को जांच हेतु दिया गया डिप्टी कलेक्टर द्वारा 1987 में यह फैसला लिखा गया कि उक्त जमीन की रजिस्ट्री पहले हो गई थी और कलेक्टर द्वारा परमिशन बाद में दी गई थी जबकि आदिवासी के साथ कोई कपट नहीं हुआ था इसके बावजूद इस आधार पर उक्त अंतरण अवैध है। ट्रेनी डिप्टी कलेक्टर के उक्त फैसले को कमिश्नर और रेवेन्यू कोर्ट में भी कंफर्म किया गया किंतु इन सारे फैसलों का राजस्व रिकॉर्ड में कहीं अमल दरामद नहीं हुआ कहीं किसी खसरा b1 और पावती में इसका उल्लेख नहीं हुआ और वह जमीन सामान्य लोगों को अंतरण होती रही। गलती राजस्व विभाग द्वारा की गई और सजा मुस्तफा और मोहम्मद कागदी को मिली जबकि वह लाखों रुपए का टैक्स हर साल भरते हैं। कलेक्टर के आदेश के खिलाफ जिला न्यायालय में न्यायाधीश अंजय सिंह के यहां मुस्तफा मोहम्मद कागदी के अभिभाषक आलोक पुरोहित द्वारा दावा लगाया गया। उक्त दावे में कलेक्टर भी पार्टी थे किंतु आदिवासी के हितों के संरक्षण के नाम पर प्राकृतिक न्याय की धज्जियां उड़ाते हुए जिस आसमानी सुल्तान तरीके से कार्रवाई की गई थी। कोर्ट का नोटिस मिलने के बाद भी कलेक्टर शासन की तरफ से कोई वकील उपस्थित नहीं था आदिवासियों द्वारा अपने खर्चे पर इंदौर से वकील बुलाया गया था किंतु प्रकरण की न्यायिक खामियों के बारे में पेश की गई सुप्रीम कोर्ट की दलीलों के बाद न्याय हित में न्यायालय ने इस केस को सुनने का फैसला किया और केस की मेंएबिलिटी पर बहस में ऐसे सुनवाई योग्य पाया। जिला कलेक्टर की कार्रवाई के जबरदस्त प्रेस और मीडिया कवरेज के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शाबाश रतलाम कलेक्टर के साथ उनके फोटो को ट्वीट किया था। लेकिन बाद में आदिवासियों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया यही कारण है कि आदिवासियों को खुद अपने खर्च पर महंगा वकील करना पड़ा और उसके बाद भी नतीजे में 0 क्या सरकार आदिवासियों को वकील करने के लिए उनके द्वारा दिए गए पैसे वापस करेगी और खुद इस केस को लड़ेंगी। या आदिवासियों के हित में झूठा सच्चा दिखावा करने के लिये इस तरह की अवैधानिक कार्रवाई जारी रहेगी जो सामान्य लोगों और आदिवासियों के बीच की खाई को और चौड़ा करेगी।

