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समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ है चुप हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।

BySurendra Jain

Nov 13, 2021

खबर पक्की :13 नवंबर रतलाम, आज मन बहुत उदास है, कुछ भी लिखने का मन नहीं कर रहा है पर फिर भी कलम उठा कर लिखना जरूरी है क्योंकि समाज और शहर के प्रति अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता। मैं मूल रूप से जावरा का रहने वाला हूं और 1990 की शुरुआत में मेरी पटवारी पद पर नियुक्ति हो गई थी और बाजना पोस्टिंग की गई थी 15 दिन तक मैं नौकरी पर गया और और दुखी फटे हाल लोगों से जब अफसर और कर्मचारियों को पैसे वसूलते देखा तो इस भ्रष्ट व्यवस्था का अंग नहीं बनने का फैसला किया और 15 दिन की नौकरी का पैसा ना लेते हुए वही नौकरी को अलविदा कह दिया। और छोटा मोटा काम करते हुए चूंकि पिताजी नवभारत टाइम्स के पत्रकार थे और मुझे भी इस पेशे में रुचि थी तो 1991 में हमेशा के लिए रतलाम में बसने का फैसला किया और पत्रकारिता के साथ लोहे का बिजनेस किया ता कि जीवन यापन के लिए किसी से ब्लैकमेल करके पैसा ना लेना पड़े। इस शहर के लोगों ने मुझे इतना प्यार और सम्मान दिया के उसका कर्ज में ताउम्र नहीं उतार सकता हूं। इन 30, 31 सालों में इस शहर में दर्जनों कलेक्टर एसपी आए और चले गए इनमें से कुछ एक तो principal सेक्रेट्री लेवल और DGP के पद तक पहुंचे जिनमें से अनेकों के साथ आज भी जीवंत संपर्क है। हर अधिकारी कर्मचारियों ने अपने स्तर पर इस शहर और जिले को सजाने संवारने की कोशिश की और लोगों के दिलों में अपनी छाप छोड़ी किसी ने कम किसी ने ज्यादा। शहर में सड़कों के चौड़ीकरण को लेकर सागोद रोड और सैलाना रोड पर पहले वर्तमान में चल रही तोड़फोड़ से भी बड़ी तोड़फोड़ देखी किंतु शहर के व्यापक हित में जनता ने उस तोड़फोड़ को जायज मानते हुए अपने आर्थिक नुकसान को मंजूर किया। कोरोना महामारी के दौरान जब मई माह में वर्तमान जिला प्रमुख की नियुक्ति हुई थी तो उनकी कार्यशैली को देखते हुए लगा था कि जिले को एक अच्छा अधिकारी मिला है और जिले के विकास को पंख लगेंगे। किंतु 31 साल में एक से एक धुरंदर अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यशैली देखने के बाद मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ यह कह रहा हूं की इतना संवेदनहीन प्रशासन मैंने आज तक नहीं देखा। और ना ही इतना निष्क्रिय विपक्ष और ना इतने निष्क्रिय जनप्रतिनिधि जो जनता के इतने दुख तकलीफ के बावजूद उनके दर्द में खड़े नहीं हो रहे है। मामला द्वारका रेजिडेंसी का हो या नामली जावरा आलोट में कंक्रीट की सड़कें उखाड़ने का हो हर जगह सिर्फ और सिर्फ आम आदमी का नुकसान किया जा रहा है साफ-सुथरी सड़क किसी भी शहर की पहचान होती है स्थानीय निकाय और जिला प्रशासन अपनी सड़कों को तो सुधार नहीं रहा अपने दफ्तरों और कर्मचारियों में व्याप्त भ्रष्टाचार के रोग को दूर नहीं कर पा रहा ऊपर से जनप्रतिनिधि इस भ्रष्टाचार से लड़ने और विरोध करने के इसको सिस्टम का अंग बता कर इनकी हौसला अफजाई कर रहे है। कल कनेरी रोड पर कंक्रीट की सड़क को उखाड़ने के बाद जिन तीन मध्यमवर्गीय परिवारों के कॉटेज को तहस-नहस किया गया उन परिवारों ने अपने गहने और जेवर बेचकर और ब्याज पर पैसे उधार लेकर अपने परिवार की खुशी के लिए उन कॉटेज को खरीदा था। उन कॉटेज के तहस-नहस होने के बाद कॉटेज मालिक के परिवार की महिला और बच्चों का रुदन सुनकर किसी भी संवेदनशील मनुष्य की आत्मा सिहर उठती। जिले के तमाम दफ्तर में व्याप्त भ्रष्टाचार की साफ सफाई करने और आम जनता की भलाई करने और जिले में कानून व्यवस्था की स्थिति बनाने के लिए गुंडे माफियाओं पर कार्रवाई करने के सरकार की मंशा को पलीता लगाते हुए सीधे सच्चे नागरिकों को भू माफिया बताते हुए उन पर कार्रवाई किसी भी आम नागरिक के गले नहीं उतर रही है जवाबदारों को इसका जवाब देना ही होगा। जिला प्रशासन की इस कार्रवाई पर कुछ पाठकों ने अपनी राय भेजी है उन्हें ज्यों का त्यों यहां उद्धत कर रहा हूं।(1) अंधेर नगरी चौपट राजा, तोड़ तोड़ कर सारा कंक्रीट खा जा (2) कलेक्टर तोड़ देवें, विधायक जी भरमा लेवे, मतदाता यह कह देवे हमारी भूल कमल का फूल

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