खबर पक्की: 19 अक्टूबर रतलाम, न खाता न बही हमने जो कहा वही सही की तर्ज पर चल रहा जिला प्रशासन व नगर निगम का निजाम। जी हां आपने सही पढ़ा कल सैलाना ओवर ब्रिज से लगी हुई द्वारका रेजिडेंसी की कंक्रीट सड़क को जिस अंदाज में तोड़ा गया उससे तो यही लगता है के जिला प्रशासन और नगर निगम को रतलाम में किसी कानून किसी संविधान की दरकार नहीं है और अफसर जो कह दे वही ब्रह्म वाक्य है। जिस द्वारका रेजिडेंसी को पूर्व कलेक्टर रुचिका चौहान द्वारा शिकायत पर जांच कर राजस्व सचिव को रिपोर्ट भेजी थी और क्लीन चिट दी थी उसी द्वारका रेजिडेंसी के सामने के 70, 80 साल से चले आ रहे सार्वजनिक रास्ते को जिसे बिल्डर ने कंकरीटिंग करके करके बढ़िया बना दिया था और जिसे जिला प्रशासन ने फेंसिंग करके अपने कब्जे में ले लिया था उस कंक्रीट की सड़क को जिला प्रमुख के मौखिक आदेश पर निगमायुक्त द्वारा मौखिक आदेश देकर निगम इंजीनियर सुरेश व्यास एवं सोनी द्वारा उखाड़ कर जिस बहादुरी का प्रदर्शन किया गया उसकी जितनी तारीफ की जाए कम है हो सकता है उनके इस बहादुरी भरे प्रदर्शन के लिए इनको 26 जनवरी पर अवार्ड से नवाजा भी जाए। 29 अगस्त को जब सड़क पर फेंसिंग कर उसे बंद करने की कार्रवाई की गई थी तब कहा गया था कि जिन अधिकारियों कर्मचारियों ने गलत तरीके से परमिशन दी है उन सब के खिलाफ f.i.r. करवाकर कार्रवाई की जाएगी। लेकिन किसी भी अधिकारी व कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई न करते हुए एक निर्बल असहाय और कानून को मानने वाले व्यक्ति के खिलाफ जिस तरह कानून का दुरुपयोग किया गया वह रतलाम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा क्योंकि बिल्डिंग बनाने में जितनी तरह की परमिशन होना चाहिए वह सब होने के बावजूद उनको बगैर निरस्त किए रविवार को छुट्टी के दिन रात को 12:00 बजे निगम इंजीनियर द्वारा यह बताया जाता है कि कल सुबह आपके सामने की सड़क तोड़ दी जाएगी इसे आप कानून के दुरुपयोग के अलावा और क्या संज्ञा देंगे। यह सिर्फ कांक्रीट के सड़क नहीं टूटी है उस सरकार से विश्वास टूटा है जो जनता के हित के लिए काम करने का दंभ भरती है। कलेक्टर नगर निगम टाउन कंट्री प्लानिंग और अन्य अनेक विभाग जो निर्माण से संबंधित अनुमति को जारी करते हैं इस कार्रवाई के बाद वे सारी अनुमतिया महज कागज के टुकड़ों में तब्दील हो गई है इससे इन संस्थाओं और इनके प्रमुखों की साख और विश्वसनीयता टुकड़े टुकड़े हो गई है। कंक्रीट के सड़क के टूटने के साथ ही स्मार्ट सिटी बनने का सपना भी टूटा है क्योंकि जिनके जिम्मे स्मार्ट सिटी बनाने का दायित्व है जब उन्हें कंक्रीट की शानदार सड़क पसंद नहीं तो सारी उम्मीद खत्म हो जाती है। यह सिर्फ कंक्रीट की सड़क नहीं टूटी है जनप्रतिनिधियों पर जनता का अगाध विश्वास भी टूटा है जिन्हें जनता इस उम्मीद में चुनती है कि मुसीबत के वक्त वे उनका साथ देंगे। इस कंक्रीट की सड़क के टूटने के साथ-साथ निवेशकों का हौसला भी टूटा है वित्तीय संस्थाओं का भरोसा भी टूटा है अब वे किन कागजों पर भरोसा करेगी और जनता का भरोसा भी टुटा है पर पता नहीं मैं यह सब क्यों और किसके लिए लिख रहा हूं धर्म, जाति, गाय, हिंदू, मुस्लिम के लिए हजारों की तादाद में सड़क पर उतर आने वाले लोग पता नहीं कब अपने सामूहिक हितों के लिए खड़े होंगे इन कुम्भकर्णी नींद में सोए हुए लोगों के लिए एक शायर का शेर याद आ रहा है, की मुर्दों को घर घमंड है अपनी नींद पर, तो शर्त लगा के सो ले मेरी तकदीर से। खैर कंक्रीट की सड़क तोड़ देने से कोई खुदा नहीं बन जाता ऊपर की अदालत में सब को जवाब देना है और वहां सब का हिसाब होता है।

