सुनो हिंदुस्तान के कर्णधारों…आप बहुत ज़ोर शोर से… मेरे नाम का नारा लगाते- लगाते नहीं अघाते…बड़ी शान से आप कहते आए हैं …”कौन बनाता हिंदुस्तान भारत का मजदूर किसान” और मेरे कान में घुलती रहीं हैं आपकी छलावे भरी आवाज़….इस एक आवाज़ ने जाने कितने झंडे लाल किए…कितने ख़जाने मालामाल किए…जाने इसकी दम भरी सरकार हिलाने वाली ताक़त ने कितने गाल गुलाब कर दिये… मेरी वेदना..पीड़ा.. दर्द..दुख..तक़लीफ़ को तुमने संवेदना की पैकेज़िंग में जब चाहा…जैसा चाहा…जितना चाहा…हमेशा बेचा…और मज़ाल हैं कि मैंने कभी उफ़्फ़ तक भी किया हो.. तुम्हें सौगंध हैं उस सडांध मारती सियासत की…जिसकी खुश्बू मेरे..फटेहाल कपड़ों और पसीने भरे बदन के बूते ही… फैलती रही हैं। सुनो ! आज मौक़ा भी हैं… दस्तूर भी.. इस नारे को ज़िंदा कर दो…जी लो मेरे साथ वैश्विक महामारी के संकट भरे दिनों में.. क्या आप थोड़े दिनों के लिये…मेरी खातिर…उस भूख का अहसास करेंगे.. जो मेरी नन्हीं बेटी को…चांद में रोटी के टुकड़े दिखा रही है…सरकार के मेरे से जुड़े सरोकार… नित..नये कीर्तिमान रच रहे हैं… रैन-बसेरों से…मुझे वापस औक़ात…यानि ज़मीनी बिछौने और आसमानी चादरों के बीच पटक रहे है।
आप तो भुला चुके…याद दिलाने की गुस्ताख़ी कर रहा हूँ… आपकी अट्टालिकाओं…आपके महलों… आपके सपनों के घरों… आपके सुंदर आशियानों को बनाने वाले…अगिनत मजदूर आज एक बार फिर से मजबूर हो चले है..दरअसल मेरे साथ चलने वाली मजबूरी..मेरे जन्म से आखिरी सफर तक..बदस्तूर चलती आई है। दिन बदल गए.. महीने बदले..साल बदले..सदियां बदल गई.. लेकिन !! लेकिन !! नहीं बदली तो मेरी तस्वीर और मेरी तकदीर..आज भी मैं मजदूर हूं शायद इसीलिए मजबूर हूं। मैं लोकतंत्र की 5 साल में एक बार मज़बूत होने वाली वह बुनियाद हूं..जो चुनावी उत्सव के दौरान..हर पार्टी की आंखों का तारा.. बन जाती है अदद थोड़े से कहे -अनकहे.. चाहे -अनचाहे..उदर पूर्ति से जुड़े स्वार्थ की पूर्ति के खातिर ..। वैसे मेरे ऊपर असंख्य लेखकों ने..चिंतकों ने.. और कवियों ने बहुत कुछ लिखा.. इतना लिखा कि समुद्र भर जाए.. इतना दुनिया को बताया कि पहाड़ खड़े हो जाएं.. लेकिन मैं जहां था मैं आज भी..वही हूं क्योंकि मैं मजदूर हूं। और तो और मेरे नाम पर कई ऐसी पार्टियां भी खड़ी हो गई.. जिन्होंने अपने ख़जाने..मेरी संवेदना..मेरी वेदना.. मेरी पीड़ा..मेरे दर्द..मेरे दुख..मेरे कष्ट को बेचकर भर लिए.. लगातार भर रहे हैं.. पहले भी भरते थे..आज भी भर रहे हैं..यह मेरी नियति का हिस्सा है लेकिन जब से कोरोना संक्रमण ने पांव पसारे हैं तुम निर्लज्जता के साथ मेरे सबसे बड़े धन का सरेराह सौदा कर रहे हो..वह इकलौता गहना हमारी ग़रीब जमात को तुम धनपतियों से अधिक अमीर बनाता हैं.. और वह है “मेरी खुद्दारी.. मेरा स्वाभिमान” याद रहें मेरी पीढ़ियां मुफ़लिसी में पैदा हुई..और इसी में मरती रही लेकिन अमीरी की लालसा.. में कभी किसी ने ज़मीरी..खुद्दारी का सौदा नहीं किया। मुझ मजदूर के लिए अपने गांव..अपने वतन..अपनी गली..अपना मोहल्ला..सबकुछ कोरोना की भेंट चढ़ा दिया गया..और रोना ये हैं कि मेरा समूचा समाज आज भी मेहनत करके खाने का आदी हैं..जो चाहते हुए भी असंभव हो चली है लेकिन सरकार !! याद रखना.. मैं आपके आगे हाथ ना फैलाऊंगा भले ही कोरोना नहीं भूख से मर जाऊंगा… क्योंकि मैंने मां की कोख से बस ! यहीं सीखा है
” भूख लगती हैं तो पत्तों पे गुजारा कर लें
दरे मग़रूर के फेकें हुए टुकड़ों पे ना जा ”
मजदूर दिवस विशेष: फुटपाथ पर अखबार बिछाकर सो जाता। मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाता
