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फैजान हत्याकांड, आत्ममुग्धता से आत्मअवलोकन की ओर रतलाम पुलिस।

BySurendra Jain

May 5, 2019

खबर पक्की: 5 मई रतलाम,कल फैजान हत्या कांड से संबंधित पत्रकार वार्ता लेते हुए डी आई जी गौरव राजपूत ने जिस तरह फैजान को जिंदा ना बचा पाने के लिए अफसोस व्यक्त किया उससे साफ पता चलता है है की यदि पुलिस थोड़ा ज्यादा प्रोफेशनल एप्रोच से काम लेती तो हो सकता था कि उस मासूम की जान बच जाती। 13 अप्रैल को फैजान की गुमशुदगी की खबर दर्ज होने के बाद यदि पुलिस तत्काल हरकत में आ जाती और इलाके को सील कर एक-एक घर की गंभीरता से तलाशी लेती और 7 दिन बाद मंदसौर से बुलाए गए डॉग को पहले ही दिन बुलवा लिया जाता तो हो सकता था इस घटना का खुलासा उसी दिन हो जाता और अपराधी भी पकड़ में आ जाता और शायद मासूम भी जिंदा बच जाता। लेकिन शायद होनी को यही मंजूर था इसीलिए फैजान को जिंदा नहीं बचाया जा सका लेकिन फैजान की मौत का अफसोस डी आई जी गौरव राजपूत के साथ साथ एस पी रतलाम गौरव तिवारी के चेहरे पर साफ देखा जा सकता था यही कारण रहा कि कल उनका जन्मदिन होने के बावजूद उनके चेहरे पर हमेशा दिखाई देने वाली चमक और मुस्कुराहट गायब थी लेकिन अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। इस घटना से सबक लेकर रतलाम पुलिस को आत्ममुग्धता से बाहर आकर आत्मअवलोकन करना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। पुनश्च: कल किन्ही कारणों से फैजान हत्याकांड के खुलासे की पत्रकार वार्ता में मैं नहीं आ पाया था किंतु मुझे पता चला कि मेरी बिरादरी के कुछ महानुभाव इस दुखद प्रसंग के खुलासे के वक्त भी एसपी साहब का जन्मदिन मनाने के लिए केक लेकर पहुंच गए थे वह तो भला हो एस पी साहब का कि उन्होंने विनम्रता के साथ मना कर दिया, तो पुलिस के साथ-साथ पत्रकारों को भी आत्मा अवलोकन करना चाहिए की किस मौके पर किस तरह का व्यवहार किया जाए जिससे संस्था और बिरादरी के लोगों का सम्मान बरकरार रह सके।

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