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जप, तप, त्याग, तपस्या से मनाएं अभ्युदय चातुर्मास, आचार्य प्रवर श्री विजयराजजी मसा का आव्हान, छोटू भाई की बगीची में चातुर्मासिक प्रवचन शुरू

BySurendra Jain

Jul 2, 2023

खबर पक्की, 2 जून, रतलाम। बारह महीनों में वर्षावास के चार महीने अति महत्वपूर्ण है। इनमें कुछ हासिल नहीं किया, तो शून्य मिलेगा। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में वर्षा के चार महीनों में की गई किसान की मेहनत ही जैसे देश की अर्थ व्यवस्था चलाती है। वैसे ही धर्म का क्षेत्र भी है। इन चार महीनों में धर्म नहीं किया, तो कुछ नहीं मिलेगा। अभ्युदय चातुर्मास को जप, तप, त्याग और तपस्या कर मनाएं।
यह आव्हान परम पूज्य प्रज्ञा निधि युगपुरूष आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने किया है। श्री हुक्मगच्छीय साधुमार्गी शान्त क्रांति जैन श्रावक संघ रतलाम के तत्वावधान में समता शीतल पैलेस छोटू भाई की बगीची में आयोजित प्रवचन के दौरान आचार्यश्री की प्रेरणा से कई श्रावक-श्राविकाओं ने तप और त्याग के प्रत्याख्यान लिए। आचार्यश्री ने प्रवचन में कायोत्सर्ग पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि तप करो, तप नहीं हो, तो जप करो और जप नहीं हो, तो कायोत्सर्ग तो करना ही चाहिए। किसान को जैसे बरसात की प्रतीक्षा होती है, वैसे ही आत्म कल्याण के लिए मनुष्य को चातुर्मास की प्रतीक्षा होना चाहिए। चातुर्मास में देवशयनी एकादशी के बाद सारे मांगलिक कार्य बंद हो जाते है, व्यापार भी प्रभावित नहीं होता, इसलिए अधिक से अधिक धर्म करने का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि किसान को जैसे चार महीने के पुरूषार्थ के बाद फसल का वरदान मिलता है, वैसे ही तप, जप, त्याग और तपस्या के मार्ग पर चलने वाले को धर्म के माध्यम से आत्म कल्याण का मार्ग मिल सकता है।
आचार्यश्री ने कहा कि साधु-संतो के लिए चार महीने स्थायी वास की व्यवस्था भी इसीलिए है कि वे एक स्थान पर रहकर आत्म कल्याण कर सके। उनसे प्रेरणा लेकर चातुर्मास मे ंसबको अधिक से अधिक धर्म से जुडने का प्रयत्न करना चाहिए। उन्होंने अभ्युदय चातुर्मास को सफल बनाने के लिए युवाओं को विशेष मार्गदर्शन दिया। इससे पूर्व उपाध्याय, प्रज्ञारत्न श्री जितेशमुनिजी मसा ने कहा कि चातुर्मास चतुर बनने का माध्यम है। चतुर बनने का प्रयास करने वाला ही भोग से त्याग की और अग्रसर हो सकता है। विद्वान सेवारत्न श्री रत्नेश मुनिजी मसा ने भी विचार व्यक्त किए। संचालन हर्षित कांठेड द्वारा किया गया।

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