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कलेक्टर के जिस आदेश पर मुख्यमंत्री ने शाबाश कलेक्टर रतलाम लिखा था उस आदेश की वैधानिकता पर कोर्ट ने सवाल उठाते हुए सुनवाई में लिया

BySurendra Jain

Mar 16, 2022

खबर पक्की: 17 मार्च रतलाम, रतलाम 08 जुलाई 2021/ ग्राम सांवलियारुंडी का गरीब आदिवासी थावरा अब गरीब नहीं रहा। उसकी बेशकीमती भूमि करोड़ों रुपए मूल्य की भूमि उसे वापस मिल चुकी है। कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम की संवेदनशीलता ने गरीब थावरा तथा उसके भाइयों मंगला एवं नानूराम को उनकी करोड़ों की भूमि वापस दिलवा दी है जो अन्य व्यक्तियों के कब्जे में थी। थावरा जब कलेक्टर से अपनी भूमि की पावती एवं खसरा नकल प्राप्त कर रहा था तब उसके चेहरे की खुशी देखते ही बनती थी, वर्षों बाद खोया हुआ सुकून पुनः उसके चेहरे पर झलक रहा था।
रतलाम मुख्यालय से 10 किलोमीटर दूर ग्राम सांवलियारुंडी के रहने वाले आदिवासी मंगला, थावरा तथा नानूराम भावर के अनपढ़ गरीब पिता को वर्ष 1961 में किन्ही व्यक्तियों द्वारा बरगला कर ओने-पौने दामों में भूमि हथिया ली गई थी। लगभग 16 बीघा जमीन खो देने के बाद यह आदिवासी परिवार मजदूरी करके 60 सालों से अपना गुजर-बसर जैसे-तैसे कर रहा था। इसी दौरान थावरा तथा उसके भाइयों द्वारा अपनी भूमि वापस लेने के लिए बहुत कोशिश की गई लेकिन नतीजा हाथ नहीं आया था। काफी कोशिशों के बाद 1987 में तत्कालीन एसडीएम द्वारा आदेश पारित किया जाकर वर्ष 1961 का विक्रय पत्र शून्य घोषित किया गया और भूमि का कब्जा प्रार्थीगण आदिवासियों को दिए जाने का आदेश जारी हुआ परंतु आदिवासी भाइयों का नाम राजस्व रिकार्ड में दर्ज नहीं किया जाकर कब्जा नहीं दिलाया गया। निर्णय के विरुद्ध जिन व्यक्तियों के कब्जे में भूमि थी उनके द्वारा विभिन्न न्यायालयो एव फोरम पर अपील की जाती रही। समय अंतराल में भूमि अन्य व्यक्तियों द्वारा एक से दूसरे को बेचे जाने का क्रम जारी था।
सभी स्तरों से अपने पक्ष में फैसला आने के बाद भी भूमि का कब्ज़ा नहीं मिलने पर विगत सप्ताह थावरा कलेक्ट्रेट आकर कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम से मिला और उनको अपनी भूमि पर कब्जा दिलाने के लिए आवेदन दिया। कलेक्टर ने संवेदनशीलता के साथ तत्काल एसडीएम रतलाम शहर को एक सप्ताह में आदिवासी के नाम उसकी भूमि के दस्तावेज तैयार करने और कब्जा दिलाने के निर्देश दिए। आदेश के पालन में एसडीएम अभिषेक गहलोत, नायब तहसीलदार संतोष रत्नावत, राजस्व निरीक्षक तरुण रघुवंशी, पटवारी गिरीश शर्मा द्वारा पूरी मेहनत से काम करते हुए रिकॉर्ड का अध्ययन करके दस्तावेज तैयार किए। थावरा तथा उसके भाइयों के नाम से पावती एवं खसरा तैयार किया गया। 8 जुलाई को थावरा एवं उसका भाई मंगला जब अपने भांजे-भतीजे तथा दामाद के साथ कलेक्ट्रेट आया, कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम के हाथों अपनी भूमि की पावती तथा खसरा नकल प्राप्त की। अब आदिवासी परिवारों की खोई हुई खुशी वापस लौट आई है।
थावरा ने कहा कि वर्षो बीत गए लड़ते-लड़ते, अपनी बाप-दादा की भूमि वापस लेने के लिए परंतु अब वह समय आया जब हमारी भूमि हमें वापस मिल गई है। इसके लिए मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान तथा हमारे जिले के कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम को बहुत-बहुत धन्यवाद।
कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम ने बताया कि उनके द्वारा एसडीएम को आदेशित किया गया है कि यदि आदिवासी थावरा और उसके भाइयों की भूमि पर यदि किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कोई हस्तक्षेप पुनः किया जाता है तो एट्रोसिटी एक्ट के तहत प्रकरण दर्ज किया जाए। यह खबर यहाँ तक आपने 8 जुलाई 2021 को पढ़ी थी। और इस खबर को अखबार में 8 कॉलम में प्रमुखता से स्थान मिलने के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीट किया था कि शाबाश रतलाम कलेक्टर। लेकिन सस्ती लोकप्रियता को अर्जित करने के लिए की गई उक्त कार्रवाई को और मुख्यमंत्री के शाबाशी के ट्वीट को खुद कलेक्टर ने कितनी गंभीरता से लिया यह इस बात से साबित हो जाता है की कलेक्टर की इस गैर कानूनी कार्रवाई के खिलाफ जमीन मालिक मोहम्मद और मुस्तफा ने अपने विधान अभिभाषक आलोक पुरोहित के माध्यम से कलेक्टर को धारा 80 में नोटिस दिया था और यह बताया था कि उक्त केस आपके अवैधानिक आदेश के खिलाफ कोर्ट में लगाया जा रहा है और माननीय न्यायाधीश Anjay Singh की कोर्ट द्वारा भी उक्त संबंध में कलेक्टर को नोटिस भेजे गए थे। किंतु अपने पावर के दंभ में चूर कलेक्टर द्वारा न्यायालय के उस नोटिस को हवा में उड़ा दिया गया और सरकारी वकील को उस केस में लड़ने के लिए पाबंद नहीं किया गया फल स्वरूप कलेक्टर के उस अवैधानिक आदेश पर सरकार की तरफ से कोई वकील खड़ा तक नहीं हुआ आदिवासियों द्वारा खूब पैसा खर्च कर इंदौर के एडवोकेट संदीप कोचट्टा को अपने पक्ष में लड़ने के लिए तैयार किया गया संदीप कोचटा द्वारा केस चलने योग्य नहीं है इस मुद्दे पर लगभग 2 घंटे बहस की गई किंतु विद्वान अधिवक्ता आलोक पुरोहित द्वारा उनके द्वारा पेश दलीलों की काट में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग पेश कर एसडीएम कोर्ट कमिश्नर कोर्ट और रेवेन्यू बोर्ड के आर्डर को तथा वर्तमान कलेक्टर के आदेश को अवैधानिक बताते हुए खारिज करने की विनती की जिस पर विद्वान न्यायाधीशअंजय सिंह द्वारा प्रतिवादी की तमाम दलीलों को खारिज करते हुए केस को सुनवाई योग्य होने का आदेश पारित करते हुए 28 मार्च अगली तारीख लगा दी जिस पर स्टे और कब्जा दिलाने की कार्रवाई पर सुनवाई होगी। कोर्ट के इस आदेश से साफ हो गया कि कलेक्टर आदिवासियों के हितों के संरक्षण के प्रति गंभीर नहीं थे और महज सस्ती लोकप्रियता के चलते उन्होंने उक्त पूरी कार्रवाई को अंजाम दिया था अन्यथा सीएम की शाबासी मिलने के बाद तो मुख्यमंत्री की शाबाशी की लाज रखने के लिए ही उन्हें पूरा जोर लगा देना था और कोर्ट को संतुष्ट करना था की आदिवासियों को उनके हक मैं दिलाया गया उनका फैसला सही है। किंतु कलेक्टर द्वारा अपनी कार्यवाही को इतिश्री मान कर कोर्ट के नोटिस को हवा में उड़ा देने का खामियाजा और आर्थिक नुकसान गरीब आदिवासियों को ही उठाना पड़ रहा है। और कलेक्टर की इस तरह की कार्रवाई से जहां एक और सामान्य नागरिक और आदिवासियों में अविश्वास की खाई बड़ी है और इस कारण आदिवासी अपनी जमीन बेचने के लिए दरबदर भटक रहा है लेकिन उसे कोई खरीदार नहीं मिल रहा है इस कारण क्षेत्र में बरसों से व्याप्त सामाजिक सद्भाव को गहरा आघात पहुंचा है। क्या मुख्यमंत्री कोर्ट के इस फैसले के बाद भी कुछ tweet करेंगे।

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