खरी खरी
खबर पक्की: 15 मई रतलाम, 2 दिन पहले 16 मजदूर रेल की पटरियों पर कट गए कल 37 मजदूर सड़क दुर्घटना में मर गए। जब से लॉक डाउन की घोषणा हुई है निरंतर मजदूरों की बद से बदतर
होती स्थिति का चित्रण अख़बारों और टीवी चैनलों में आ रहा है सेव इंडिया फाउंडेशन के मुख्य कार्यकारी पीयूष के अनुसार लॉक डाउन के बाद अभी तक देश में 368 मजदूर मर चुके हैं किंतु लगता है सरकार के कानों पर कोई जू नहीं रेंग रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 33 मिनट का भाषण देते हैं किंतु 33 मिनट में 33 सेकंड भी प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा पर नहीं बोलते। 14 जनवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन कोरोना को विश्वव्यापी महामारी करार देता है जनवरी में ही केरल में कोरोना का पहला मरीज मिल जाता है किंतु सरकार जनवरी में कोई कदम नहीं उठाती फरवरी में भी कोई कदम नहीं उठाती दिल्ली चुनाव में व्यस्त रहती है उसके बाद ट्रंप की यात्रा में लग जाती है मार्च में मध्य प्रदेश सरकार गिराने के कारण और देरी करती है और मध्य प्रदेश में सरकार बनते ही अचानक 25 मार्च को पूरे देश के 138 करोड़ लोगो को 21 दिन के लिये जो जहां है वही नजरबंद रहने का हुक्म जारी करती है सारी ट्रेनें सारे एयरपोर्ट सारी बसें ऑटो टेंपो आवागमन के सारे साधन ठप कर देती है। सारे देश को पुलिस के हवाले कर दिया जाता है सारी दुकानें सारी फैक्ट्रियां उद्योग धंधे निर्माण कार्य ठप कर दिए जाते हैं करोड़ों लोग बेरोजगार हो जाते हैं और भूखे मरते यह लोग मार्च-अप्रैल मई की चिलचिलाती धूप में मजबूर होकर पैदल पैदल अपने अपने गांव की ओर निकल पड़ते हैं रास्ते में जो जहां जिस तरह इन मजदूरों को लूट सकता था उसने लूटा ट्रक वालों ने बिठाने के हजारों लिए और सेवा करने वालों ने सेवा भी की जब धड़ाधड़ दुर्घटना में मजदूरों के मरने की खबरें हाईलाइट होने लगी तब जाकर सरकार की नींद खुली और उसने श्रमिक एक्सप्रेस चलाने का निर्णय लिया। कोरोना महामारी की आड़ में सरकार ने अपने लिए असीमित अधिकारों का सृजन किया किंतु जनता को होने वाले दुख दर्द तकलीफ के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह करने में विफल होती दिखाई दे रही है यही कारण है कि 368 मजदूरों की मौत हो चुकी है मजदूरों के साथ साथ किसान और मध्यम वर्ग छोटे दुकानदार हाथ का काम करने वाले कारीगर हर आदमी को आर्थिक मार पड़ी है इस लॉक डाउन में।
…….. मध्यम वर्ग परिवार की स्थिति बहुत खराब हो गई है। ना “भीड़” में खड़े होकर “मांग” सकते है, ना “लंंगर” में खा सकते हैं। ना मदद करने वालों से “राशन की पोटली” मांग सकते है। जेब में नगदी नही हैं, तनख्वाहें मिली नही यदि कहीं से मिली भी तो टैक्स और 40 % कटौती के बाद।
खर्च भयानक बढ़ा है। लगातार तीसरा माह चल रहा है घर में राशन की खपत बढ़ी है और सब्जी आदि लेने में नगदी खर्च हो गई है। दवाइयों और बाकी छुटपुट खर्चों में सब गुल्लक भी खत्म हो गई।
सरकार बनाने-बिगाड़ने में जो वर्ग महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है उसकी स्थिति इस समय सबसे ज़्यादा खराब है। बच्चों की फीस, किश्तें, बीमा, फोन, गेस, किराना, दुध, बिजली के बिल, हाउस टैक्स, पानी का बिल आदि का भुगतान लगातार जारी ही है। हालांकि यह भी पता है कि बीमे का कोई फायदा नहींं होने वाला है। जिनके बच्चें नौकरी कर भी रहें थे वह भी एक भ्रम था, एक तरह का आई वॉश क्योकि बच्चों का “वर्क फ्रॉम होम” का भरम वो अपने तथाकथित समाज और रिश्तेदारी में बनाए रखना चाहते हैंं। हकीकत यह है कि अधिकांश की नौकरी खत्म हो गई है। मांं-बाप की पेंशन या सस्ती तनख्वाह से घर चल रहे हैंं। ऊपर से मदद करने का दिखावा करना ही पड़ रहा है और बल्कि दे भी रहें है काट कसर करके।
…….बस दिक्कत यह है कि वे अपने दर्द, आंंसू छुपाकर खाने की डिशेज परोसकर, लूडो खेलकर, ऑन लाइन गप्प करके अपने गम दिल में दबाए बैठे हैंं, पर लावा भयानक रूप से जम गया है। घरों में अब एक डेढ़ हफ्ते से ज्यादा का राशन नहींं है। पिछले साल के गेहूं खत्म हो गए हैंं। दाल चावल, साबुत अन्न, तेल से लेकर मसाले के डिब्बे अब जवाब दे रहें हैं।
……..मन मे ख़ौफ़, आंंखों मे चिंताएं और दिमाग़ में शंकाएं हैं। यदि किसी के पास थोड़ा बहुत काम भी है तो वे करने से डर रहें है कि भुगतान होगा या नही क्योंकि पुराने भुगतान पेंडिंग है और जिनका मिलना अब मुश्किल है!
……..लॉक डाउन खुल भी गया तो बैंक के सेविंग में न्यूनतम जमा राशि भी शेष नही है और अगले छह माह या एक दो साल रुपया आने की उम्मीद नही – अभी तीन से पांंच क्विंटल गेहूं के लिए ही दस बारह हजार नगद कहांं से आएंगे- यह चिंता घर कर गई है।
……..सब अमीरों-गरीबों के लिए पर हम जैसों के लिए क्या जिनके पास एक बाय एक फुट की जगह नहींं, खेत नहींं, मकान नही , दुकान नही, कोई उद्योग नहींं और कुछ भी नहींं और सब कुछ निभाकर ले जाना है सामाजिकता के नाम पर – खुद्दारी इतनी है कि अपने जमीर को जिंदा भी रखना है – किसी को कह भी नही सकते कि दस बीस हजार उधार ही दे दो।
…….मरण हमेशा इसी वर्ग का होता है ना नौकरी, ना आरक्षण, ना बीपीएल कार्ड , ना लोन, ना सुविधा और “इज्जत” के नाम पर सिवाय “श्राप” और “बद्दुआएं” मिलती है । शुरू से ही “सरकार” से तो कोई आशा भी नही कि “कभी सरकार सोचेगी” हमारे बारे में इसका सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं है ! यह सब एक मिथ्या है ढोंग है जो रचा जा रहा है सिर्फ दिखावे के लिए और सरकार चलाने के लिए इसके सिवा कुछ नहीं। “कोरोना” से ज्यादा मौते इस साल “मध्यमवर्गीय” परिवार में ” आत्महत्या से होने वाली है ? सच्चाई हमेशा कड़वी होती है लेकिन सच्चाई का सामना करना ही होता है और हमें खुद को ही इसका रास्ता निकालना होगा। मजदूर और मध्यमवर्ग की तरह किसान की भी कमर तोड़ दी है इस लॉक डाउन ने फल फ्रूट खाद्यान्न डेयरी उत्पाद किसी भी चीज के रेट किसान को इस सीजन में नहीं मिल पाए कैसी हास्यास्पद स्थिति है दारू की दुकानों पर लगी लंबी लाइनों से कोरोना नहीं फैलता है। ऑनलाइन माल बेचने वालों से कोरोना नहीं फैलता है प्रवासी मजदूरों की भारी भीड़ से कोरोना नहीं फैलता है किंतु छोटे दुकानदार जिनके यहां 10,20 ग्राहक दिन भर में आते हैं उनसे कोरोना फैलता है छोटा किसान जो सब्जी फल फ्रूट बेचने आता है उसको पुलिस डंडा मार के उठा देती है अखबार वाले भी छाप देते हैं कि अवैध फल फ्रूट पकड़े अबे इतनी भी अक्ल नहीं है कि फल फ्रूट क्या अवैध होते हैं क्या उससे कोरोना फैलता है। मात्र 3% मृत्यु दर वाले कोरोना का ऐसा आंतक फैलाया जा रहा है की आज पूरी अर्थव्यवस्था का भट्टा बैठ गया है कोरोना के नाम पर कलेक्टर और पुलिस को असीमित अधिकार दे दिए गए है जितने लोग कोरोना से नहीं मरे है उससे ज्यादा अन्य बीमारियों से लोग मर रहे हैं क्योंकि उनका इलाज नहीं हो रहा है 1975 का आपातकाल तो घोषित आपातकाल था और उस में हुई ज्यादतियों को जनता आज तक भूली नहीं है किंतु 2020 का यह लॉक डाउन भी आज की पीढ़ी कभी नहीं भूलने वाली हैं। गीता में कहा गया है जो होना है वह होकर रहेगा सरकार भी कहने लगी है कि कोरोना के साथ ही जीना होगा तो बेहतर यही होगा पुलिस और डंडा राज की समाप्ति हो जल्दी से जल्दी जनजीवन पटरी पर आए अर्थव्यवस्था को गति देने के प्रयास हो तभी मजदूर मध्यम वर्ग और किसान की चिंताओं को दूर किया जा सकेगा नहीं तो इस लॉक डाउन में बेरोजगार हुए लोग देश की कानून और व्यवस्था के लिए सरदर्द बन जाएगे वे देश के लिए भस्मासुर साबित हो उसके पूर्व उन्हें वापस काम पर लगाया जाना अत्यंत जरूरी है।
368 मजदूरों की आत्मा करे पुकार जागो मोदी जागो सरकार
