खबर पक्की: 8 अगस्त रतलाम, कल रविवार को संपन्न हुए भाजपा के महापौर और नवनिर्वाचित पार्षदों के शपथ समारोह ने रतलाम की भाईचारे और आपसी समन्वय की संस्कृति को हाशिए पर धकेल दिया क्योंकि इसके पूर्व इसी निर्वाचन में सफल हुए कांग्रेस के पार्षदों का शपथ समारोह शनिवार को संपन्न हो चुका था। इसमें जहां समन्वय की ज्यादा जिम्मेदारी सत्ता पक्ष की होती है क्योंकि विजय श्री के साथ विनम्रता आना बहुत जरूरी है तभी सफलता के साथ समन्वय बिठाया जा सकता है लेकिन विनम्रता की जगह अगर सत्ता प्राप्ति का घमंड आ गया तो क्लेश होना निश्चित है। लेकिन 67 साल के इतिहास में पहली बार कांग्रेस और भाजपा पार्षदों का अलग-अलग शपथ विधि समारोह होना यह साबित करता है कि सत्ता पक्ष ने इतने कड़े संघर्ष के बाद मिली विजय से भी कुछ नहीं सीखा और टकराव का रास्ता चुना। इसमें थोड़ी बहुत गलती निगम प्रशासन और जिला प्रशासन की भी मानी जाना चाहिए कि उन्होंने क्यों अलग-अलग शपथ दिलवाने का निर्णय किया। निर्वाचन के पश्चात होने वाला कार्यक्रम शुद्धत: सरकारी होता है और उसमें सभी पक्षों को बराबर तवज्जो दी जाती है। लेकिन कल हुआ सरकारी कार्यक्रम पूर्णत: भाजपाई कार्यक्रम था। 1,1 भाजपा पार्षद को जो आमंत्रण पत्र दिए गए वह 30 लोगों के लिए थे। लेकिन पार्षदों को कहा गया था कि वह कितने भी कार्यकर्ता को ले आए कोई बात नहीं। यही कारण था कि कार्यक्रम स्थल पर अव्यवस्था की वजह से अफरा तफरी मच गई थी। कार्यक्रम में जहां जावरा विधायक व रतलाम ग्रामीण विधायक को निमंत्रण दिया गया। लेकिन कार्यक्रम में सिर्फ जावरा विधायक शामिल हुए हमेशा की तरह प्रभारी मंत्री का नाम खानापूरी के लिए निमंत्रण पत्र पर छपा दिया जाता है लेकिन वे कभी आते नहीं है। जिस प्रेस को चुनाव के पूर्व फोन लगा लगा कर दोनों पार्टियों के लोग बुला रहे थे और निवेदन कर रहे थे कि कोई नकारात्मक खबर उनके बारे में ना लगाई जाए। चुनाव जीतते ही उसे वे लगभग भूल गए। जब रात को 8:30 बजे तक प्रेस वालों के पास निमंत्रण कार्ड नहीं पहुंचा और उन्होंने इस बात का रोष ऐसे ग्रुप में व्यक्त किया जिसमें निगम के अधिकारी पदाधिकारी और राजनेता शामिल थे तो प्रशासन चैता और देर रात तक कार्ड बांटता रहा उसके बाद भी बहुत लोग बाकी रह गए। लेकिन इस व्यवस्था की ज्यादा जिम्मेदारी सत्तारूढ़ दल की थी। यह आजादी का 75 साल है और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवाहन पर पूरे देश में तिरंगा रैलियों का आयोजन किया जा रहा है। लेकिन भाजपा के ही शपथ विधि समारोह में देश के पूजनीय और श्रद्धेय शहीदों का और महापुरुषों के पोस्टरों का जिस तरह उपयोग किया गया व चिंतन और सोच का प्रश्न है। सुभाष चंद्र बोस चंद्रशेखर आजाद भगत सिंह रानी झांसी संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जैसे अनेक का अनेक महापुरुषों को पंडाल में डेकोरेशन के लिए झालर झूमर की तरह टांग दिया गया था जो आजादी के अमृत वर्ष में यह कृत्य मेरे जैसे कई कट्टर देशभक्तों को पसंद नहीं आया। मे हालांकि कार्यक्रम में उपस्थित नहीं था किंतु वहां से लौट कर आने वालों ने जितनी बातें बताइए उन सब को अगर लिखने लगूंगा तो कई दिन लग जाएंगे। कन्या पूजन के साथ शुरू हुआ कार्यक्रम और शपथ लेने मंच पर गई निर्दलीय महिला पार्षद उमा राम चंद्र मोई को जिस तरह मंच से उतारा गया उसको लेकर पूर्व मंत्री हिम्मत कोठारी ने भी विरोध किया। सिर्फ पार्षद ही नहीं पत्रकारों को भी उनकी जगह दूसरे लोगों द्वारा हथिया लेने के कारण कवरेज करने के लिए मंच पर चढ़ जाने पर नीचे उतारा गया। कई सेल्फ गोल के बाद नगर विधायक चैतन्य कश्यप की कड़ी मेहनत से विजय हुए महापौर प्रह्लाद पटेल जो कि नगर के प्रथम नागरिक है को लोगों ने चैतन्य कश्यप के चरण स्पर्श करते देखा। लेकिन उनका यह मिजाज कितने देर तक कायम रहता है यह देखना दिलचस्प होगा। कश्यप जी ने तो अपना राजनीतिक भविष्य सुनिश्चित करने के लिए महापौर को जिताने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया अब महापौर का काम और व्यवहार शैली ही आगे आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत और हार तय करेगा।

